झारखंड बीजेपी की राजनीतिक गलियारे में शुक्रवार की सुबह अचानक से हलचल मची, जब केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर राज्यसभा के सांसद आदित्य साहू को प्रदेश में कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की चिट्ठी जारी की गई. यह हलचल इसलिए भी कि पार्टी की नजर कई महीनों से इस ओर टिकी रही है कि झारखंड में अगला और नया प्रदेश अध्यक्ष कौन.
नये प्रदेश अद्यक्ष के नामों को लेकर कई मौके पर अटकलें भी लगती रही है. वह इसलिए भी 2024 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद बाबूलाल मरांडी को विधायक दल का नेता चुना गया है और विधानसभा में उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा प्राप्त है.
इससे पहले साल 2023 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था. अभी वे प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.
वैसे प्रदेश अद्यक्ष के तौर पर बाबूलाल मरांडी लगातार सक्रिय हैं और हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ भी बीजेपी में सर्वाधिक मुखर नेता के तौर पर जाने जाते हैं.
आदित्य साहू ने वर्तमान कार्यकारी अध्यक्ष रवींद्र राय की जगह ली है. विधानसभा चुनाव के वक्त रवींद्र राय को कार्यकारी अध्यक्ष की जवाबदेही दी गई थी. जाहिर तौर पर रवींद्र राय की यह जवाबदेही खत्म हो गई है.
हर एक्शन का रियेक्शन भी होता है. भले ही वह सतह पर दिखाई नही दे. इस मामले में इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. दरअसल, रवींद्र राय पार्टी के पुराने और सांगठनिक कामकाज के लिहाज से अनुभवी नेता माने जाते हैं. उन्हें इस पद से हटाये जाने के भी मतलब निकाेल जा रहे हैं.
वैसे भी आंतिरक गुटबाजी, असमंजस और सांगठनिक बिखराव, आदिवासियों के बीच अविश्वास की वजहों से चुनावों में बीजेपी को चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा है.
2019 में अन्नपूर्णा देवी के राजद छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद रवींद्र राय को कोडरमा संसदीय सीट से टिकट काटकर अन्नपूर्णा देवी को लड़ाया गया. इसके बाद 2024 में भी अन्नपूर्णी देवी चुनाव लड़ीं और जीतीं भी.
2024 के विधानसभा चुनाव में जब रवींद्र राय को टिकट नहीं दिया गया, तो उन्हें चुनाव से ठीक पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. दरअसल, यह अप्रत्यक्ष तौर पर मनाने की कोशिश थी.
अगली कतार में कोई तालमेल और तेवर नहीं
विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी सन्निपात से तो उबरी दिख रही है, लेकिन प्रदेश में अगली कतार के नेताओं में वह तारतम्य और तेवर भी नहीं दिखता, जिससे कहा जाए कि बीजेपी की चाल बदल गई है. अभी तक बूथ से लेकर मंडल अध्यक्षों और जिला अध्यक्षों के चुनाव को लेकर सांगठनिक प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है. नए प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव भी इन्हीं चुनाव के जरिए होना था.
उधर ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा देने और झारखंड की राजनीति में वापस हुए रघुवर दास के भी नौ महीने हो गए हैं. उनकी नई भूमिका को लेकर पार्टी ने अब तक कोई फैसला नहीं लिया है. जबकि पार्टी का बड़ा धड़ा दबी जुबान से इसका पक्षधर रहा है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में रघुवर दास ही प्रदेश में मजबूत खेवनहार बन सकते हैं.
आखिर मायने क्या हैं
अब बात करते हैं बीजेपी में उभऱते नेता आदित्य साहू कौन हैं और उन्हें प्रदेश में कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाने के मायने क्या हैं.
ओबीसी कैटेगरी से आने वाले आदित्य साहू निचली इकाई से यहां तक पहुंचे हैं. प्रखंड अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष के बाद प्रदेश में उन्हें जगह मिली. इसके बाद वे आगे ही बढ़ते रहे. उन्हें एक सरल, सुलझे नेता के तौर पर भी पार्टी में देखा जाता है.
अभी झारखंड प्रदेश बीजेपी में महमंत्री का पद संभाल रहे थे. सांगठनिक कामकाज के साथ चुनावी प्रबंधन में भी उन्हें पार्टी के अंदर एक सुलझे नेता और रणनीतिकार के तौर पर देखा जाता है. आदित्य साहू का नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए भी चल रहा था.
साल 2022 में उन्हें झारखंड से राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुना गया था.. उन्हें रघुवर दास का भी कराबी माना जाता रहा है. दरअसल, 2022 में हुए राज्यसभा के लिए रघुवर दास का ही नाम आगे था, लेकिन समर्थन के सवाल पर आजसू की पैंतरेबाजी के बाद आदित्य साहू को सामने लाया गया.
आदित्य साहू के लिए रास्ता साफ
कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर आदित्य साहू की नियुक्ति के बाद पार्टी के अंदर इसकी भी चर्चा शुरू है कि आगे आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है. पार्टी ने इस पद पर पुश करने के लिए ही कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है., ताकि वे परिस्थितियों के साथ संगठन को और अच्छी तरह से संभालने के लिए तैयार हो सकें.
अचानक से पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष बदलने के बाद इसकी चर्चा भी बलवती है कि अब नेतृत्व की नजर प्रदेश में दूसरी पीढ़ी और ओबीसी चेहरे को आजमाने पर है.
इस फेरबदल के संकेत स्पष्ट हैं कि प्रदेश अध्यक्ष को लेकर अब पार्टी बिहार चुनाव के बाद ही कोई निर्णय लेगी.
पिछले 10 जनवरी को रघुवर दास के बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद से बीजेपी के गलियारे में अटकलें लगती रही हैं कि रघुवर दास को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जा सकती है.
झारखंड की राजनीति में वापसी के बाद से रघुवर दास हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ लगातार हमलावर भी रहे हैं. लेकिन आदित्य साहू को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी में एक नया चैप्टर खिलता दिख रहा है. रघुवर दास आगे किस भूमिका में होंगे इस ओर सबकी नजरें टिकी हैं. लेकिन पार्टी के इस फैसले के संकेत साफ हैं कि आदित्य साहू को अनायास कार्यकारी अध्यक्ष नहीं बनाया गया है. उनपर अहम जिम्मेदारी सौंपने के तौर पर यह कदम उठाया गया है.
बहरहाल, बड़ा सवाल यह भी है कि देर- सवेर आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिल भी जाए, या कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर वे सांगठनिक लामबंदी तथा सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के समीकरणों को तोड़ने तथा प्रदेश में पार्टी की अगली कतार के नेताओं को एकसूत्र में बांधकर माहौल बदलने में कितना सक्षम साबित होते हैं, यह देखना बाकी होगा.
