नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने झारखंड सरकार को सरंडा को वन जीव अभयारण्य (सेंक्चुरी) अधिसूचित करने के मामले में राहत देते हुए 31,468.25 हेक्टेयर भूमि को आधिकारिक रूप से अधिसूचित करने की अनुमति दी है.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सेल (SAIL) और वैध खनन लीज़ को संरक्षित क्षेत्र के प्रभाव क्षेत्र के बाहर रखा जाना चाहिए.
इसके अतिरिक्त, सरकार को एक सप्ताह के भीतर संबंधित हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है. यह आदेश मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने पारित किया.
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने एनजीटी के आदेश की तुलना में क्षेत्रफल में हुई वृद्धि के बारे में पूछताछ की. दूसरी तरफ राज्य की ओर से कपिल सिब्बल ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट और मानचित्र का हवाला दिया. और उन्होंने बताया कि डब्ल्यूआईआई ने अध्ययन करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए शुरुआत में आठ साल और 3 करोड़ रुपये का खर्च बतया था.
इसके बाद भारतीय वन्य जीव ने एक मैप भेजा, जिसमें 5519.41 हेक्टेयर को सेंक्चुअरी घोषित करने पर विचार करने का प्रस्ताव दिया गया था. इस प्रस्ताव से संबंधित फाइल डीएफओ के स्तर से होते हुए पीसीसीएफ तक पहुंची. लेकिन इस पर सरकार की अनुमति नहीं प्राप्त की गई थी. वन सचिव ने इसी प्रस्ताव की जानकारी शपथ पत्र के माध्यम से दी थी.
सरकार की तरफ को कोर्ट को बताया गया कि एनजीटी के दिशा निर्देश के आलोक में 31468.25 हेक्टेयर को सेंक्चुरी घोषित करने में कोई आपत्ति नहीं है. इसलिए न्यायालय सरकार को 31468.25 हेक्टेयर को सेंक्चुअरी घोषित करने की अनुमति दे. साथ ही इससे खनन प्रभावित ना हो, इसका आकलन कर 31468.25 को चिह्नित करने की अनुमति दे.
अनुरोध का विरोध
एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) ने पुनः-सीमांकन का अनुरोध का विरोध किया. उन्होंने यह तर्क देते हुए कहा कि सरकार ने अपने हलफनामा में पहले ही मान लिया था कि 31,468.25 हेक्टेयर, जो 126 कम्पार्टमेंट्स में विभाजित हैं, चिन्हित किए जा चुके हैं, और इस क्षेत्र में वर्तमान में कोई खनन गतिविधि नहीं हो रही है. इसलिए, पुनः-सीमांकन के लिए कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाना चाहिए.
राज्य सरकार, सेल और एमिकस क्यूरी की दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने की अनुमति प्रदान कर दी. सुनवाई के दौरान, सेल ने अदालत से अनुरोध किया कि यह सुनिश्चित हो कि उसके खनन कार्य प्रभावित न हों, क्योंकि अभयारण्य के एक किलोमीटर के दायरे में खनन प्रतिबंधित है.
कोर्ट की फटकार
गौरतलब है कि पिछले 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार द्वारा सारंडा वन्यजीव अभयारण्य (एसडब्ल्यूएल) और सासंगदाबुरु कंजर्वेशन रिजर्व (एससीआर) को संरक्षण रिजर्व अधिसूचित करने के अपने पूर्व निर्देशों का पालन नहीं करने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य के मुख्य सचिव को 8 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था.
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए राज्य को जानबूझकर देरी करने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा था कि इसका पालन न करना उसके 29 अप्रैल के आदेश की अवमानना है.
