झारखंड में घाटशिला विधानसभा उपचुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही घमासान मचा है. रणनीतिक बिसात पर गोटियां तेजी से बिछायी जा रही हैं. हर दांव- हर पेंच आजमाये जा रहे हैं. टसल तगड़ा है. साफ शब्दों में कहें, तो सत्तारूढ़ जेएमएम और प्रमुख विपक्ष बीजेपी के बीच. लेकिन जेएमएम- बीजेपी के बीच इस झकझूमर में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा भी अपना जोर दिखाने के लिए पसीना- पसीना हो रहा. साधन कम सुविधा कम, लाव- लश्कर कम. पर नारे गूंज रहे भरदम.
घाटशिला में 11 नवंबर को वोट है. झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक और सरकार में शिक्षा मंत्री रहे रामदास सोरेन के निधन से खाली इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है और रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन पार्टी के उम्मीदवार हैं. उनके सामने बीजेपी के बाबूलाल सोरेन हैं, जो 2024 के चुनाव में रामदास सोरेन से लगभग 23 हजार वोटों से हार गए थे. बाबूलाल सोरेन पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पुत्र हैं.
सोमेश की जीत तय करने के लिए हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने चुनाव प्रचार की कमान संभाल रखी है. इनके अलावा झारखंड मुक्ति मोर्चा के कम से कम 50 बड़े नेता, जिनमें मंत्री, सांसद, विधायक, पूर्व विधायक शामिल हैं, चारों तरफ फैले हुए हैं. इधर चंपाई सोरेन, बाबूलाल मरांडी, मधु कोड़ा, विद्युवरण महतो बीजेपी का मोर्चा संभाले हुए हैं.
बीजेपी के कम से कम चालीस सांसद, विधायक, पूर्व सांसद, पूर्व विधायक, पूर्व मंत्री एक- एक वोट जोड़ने की कोशिशों में जुटे हैं. ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहनचरण मांझी, पश्चिम बंगाल में बीजेपी के बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी प्रचार करके गए हैं. समीकरण तेजी से बन- बिगड़ रहे हैं और उसे संभालने में दलों के रणनीतिकारों के माथे पर बल पड़े हैं. जातीय समीकरणों को साधने की कलाबाजी पुरजोर देखी जा रही.

जेएलकेएम कितने पानी में
तब पूछा जा सकता है कि जेएमएम और बीजेपी के बीच सीधी लड़ाई और और टसल वाले मैदान में एक विधायक वाला दल झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा क्या कर रहे हैं. और बनते- बिगड़ते समीकरणों में जेएलकेएम की कैंची किस पर चलेगी. पूछा यह भी जा सकता है कि घाटशिला में जेएलकेएम कितने पानी में है और उसके सामने कौन सी बड़ी चुनौतियां हैं. तह तक झांकने के लिए झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा, पार्टी के उम्मीदवार, खेवनहार और उसके वोटों के गणित की ही चर्चा प्रासंगिक है.
कड़वा सच यह है कि झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा एक मजबूत और तीसरा कोण बनाने की लड़ाई से गुजर रहा. हकीकत यह भी है कि यहां जयराम कुमार महतो और उनकी पार्टी के सामने खोने को कम, पाने को ज्यादा है. पर इतनी चुनौती जरूर है कि अगर 8092 से ज्यादा वोट रामदास मुर्मू ने हासिल कर लिए, तो नतीजे आने के बाद जयराम के लिए जोर देकर कहने का स्पेश जरूर रहेगा कि पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाया है.

2024 में क्या हैसियत थी
2024 के चुनाव में रामदास मुर्मू को 8092 वोट मिले थे और वे तीसरे नंबर पर थे. जबकि चुनाव जीते रामदास सोरेन को लगभग 98 हजार वोट मिले थे. एक और महत्वपूर्ण बात- जेएलकेएम पहली दफा किसी उपचुनाव में उतरा है और उपचुनाव कम समय में गोल करने का खेल है. चाहे साम- दंड भेद जितने आजामाये जा सकें. इसलिए यह उपचुनाव जयराम को कुछ सीख के साथ नया अनुभव भी दे सकता है.
झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के सबसे बड़े दारोमदार और पार्टी उम्मीदवार रामदास मुर्मू के खेवनहार जयराम कुमार महतो तीन दिनों से यहां डेरा डाले हुए हैं. जयराम सुबह से रात तक प्रचार कर रहे. हर वो गांव- टोले जा रहे, जहां से वोटों की सेंधमारी की जा सके. कभी नंगे पांव कभी साधारण चप्पल में. बातें एकदम खरी- खरी. जयराम अपने भाषण में छात्रों को ई कल्याण के तहत स्टाइपेंड नहीं मिलने का मुद्दा उठा रहे. शिक्षा, रोजगार, निय़ोजन नीति, स्थानीय नीति, खनिज संपदा के दोहन, हक अधिकार की बात कर रहे. इसके साथ ही धन-बल और परिवारवाद की राजनीति पर चोट कर रहे. वे इन बातों पर भी जोर देते हैं कि मंत्री का बेटा ही मंत्री क्यों बने. विधायक का बेटा ही विधायक क्यों बने.
इससे पहले पखवाड़े भर से देवेंद्रनाथ महतो, मोती लाल महतो, प्रेम मार्डी, दमयंती मुंडा, विजय साहू, बेबी महतो, सूरज सिंह विजय सिंह, पूजा कुमारी दीपक रवानी, राजदेश रतन, संजय कुमार, महेंद्र मंडल बिहारी महतो, तरुण गोपेश, नवीन महतो, पूजा महतो सरीखे नेता प्रचार में जुटे हैं. रामदास मुर्मू के लिए भी यह उपचुनाव खुद को मांजने, मजबूत करने का अच्छा मौका है. जाहिर तौर पर वे जितना सक रहे हैं, लगे हुए हैं.

जेएमएम- बीजेपी की नजर
झारखंड मुक्ति मोर्चा अपने आदिवासी वोटों को लेकर इत्मिनान है जबकि बीजेपी जेएमएम के इस वोट बैंक पर दरक लगाने की जद्दोजहद कर रही. बीजेपी ने इस बार बांग्लाभाषी, ओड़ियाभाषी और ओबीसी वोट के समीकरणों को अपने पाले में करने की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. तो जेएमएम की रणनीति और प्रचार पर गौर करें, तो बीजेपी के इस वोट बैंक पर सेंध लगाने के लिए वह बेकरार है.
इसी वोट बैंक पर झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा की नजर है. जयराम को कुर्मी वोटों का भरोसा है। लेकिन देखना यह है कि आदिवासी इलाके में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा का प्रदर्शन किस स्केल पर रहता है. जेएलकेएम को सांगठनिक मोर्चे पर अभी क्या कुछ करने हैं इसका पैमाना भी नतीजे के सथ सामने होगा.
जयराम ही मुख्य वजह
झारखंड की नजर अगर घाटशिला उपचुनाव पर है, तो इसकी एक मुख्य वजह जयराम कुमार महतो की पार्टी का मैदान में उतरना भी है. सबकी निगाहें इस बात पर भी है कि रामदास मुर्मू को कितने वोट मिलते हैं और जेएलकेएम की कैंची किसे नफा- किसे नुकासन पहुंचाती है.
दरअसल जयराम और उनकी पार्टी ने लड़कर-भिड़कर झारखंड की राजनीति में इतनी जगह तो बना ही ली है कई मोके पर सत्ता, विपक्ष दोनों को वे खटकते हैं. इसलिए अगर जेएलकेएम का वोट ग्राफ नीचे गिरा, तो पार्टी को आलोचनाओं का भी सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.
