रांचीः राज्यपाल सह कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार ने कहा है कि दीक्षांत समारोह केवल उपाधि प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि नई यात्रा की शुरुआत है, जिसमें मेहनत, संघर्ष, सीख, साधना और आत्म-विश्वास का समावेश होता है. विद्यार्थी ही विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और पहचान के वाहक होते हैं.
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के 8वें दीक्षांत समारोह में उपाधि प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों और शोधार्थियों को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने यह बात कही.
उन्होंने किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं को देश के सच्चे विकास-नायक बताया. उन्होंने कहा कि झारखण्ड खनिज-संपन्न राज्य होते हुए भी इसकी बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है. उन्होंने जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, लघु कृषि मॉडल, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, लाह एवं मशरूम उत्पादन जैसे क्षेत्रों में संभावनाओं पर बल दिया.
राज्यपाल महोदय ने डिग्री हासिल करने वाले युवाओं का आह्वान किया कि जहाँ भी जाएँ, अपनी मातृभूमि, गाँव, किसान और अपनी जड़ों से जुड़े रहें.
उन्होंने कहा कि प्रगति तभी सार्थक है जब उसकी रोशनी समाज तक पहुँचे.
राज्यपाल ने कहा कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और गाँवों की आत्मा कृषि में है. कृषि केवल उत्पादन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा, परिवार, पर्यावरण और जीवन-दर्शन से जुड़ी हुई है.
उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा धरती झारखण्ड की भूमि कृषि, वनों और जैव-विविधता से समृद्ध है. किसान केवल ‘अन्नदाता’ ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के आधार हैं. समाज में किसान का सम्मान ही देश की वास्तविक समृद्धि का प्रतीक है.
उन्होंने आह्वान किया कि कृषि को केवल आजीविका नहीं, बल्कि सम्मान और नवाचार के क्षेत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस वर्ष बिरसा कृषि विश्वविद्यालय से 1021 विद्यार्थियों को उपाधियाँ प्रदान की जा रही हैं, जिनमें छात्राओं की संख्या अधिक है.
उन्होंने कहा कि यह बदलते भारत की नई तस्वीर है, जहाँ शिक्षित बेटियाँ समाज को दिशा दे रही है. वे अपने जीवन की नई यात्रा में आत्मविश्वास, ज्ञान और चरित्र के साथ आगे बढ़ें तथा अपने कार्यों से विश्वविद्यालय, राज्य और देश का नाम रोशन करें.
उन्होंने कहा कि झारखण्ड ने दलहन उत्पादन और सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसके लिए राज्य को ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया है. उन्होंने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सूकर नस्ल ‘झारसूक’ की प्रशंसा की, जिसकी देशभर में मांग बढ़ रही है।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि आप जहाँ भी जाएँ, अपनी मातृभूमि, गाँव, किसान और अपनी जड़ों से जुड़े रहें. प्रगति तभी सार्थक है जब उसकी रोशनी समाज तक पहुँचे.
