रांचीः वाटरमैन और ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने कहा कि झारखंड देश के उन 17 राज्यों में शामिल हो गया है, जो सुखाड़ और बाढ़ से प्रभावित होता रहा है. पिछले बीस सालों में राज्य पर्यावरणीय और जल संकट के नक्शे पर आगे बढ़ता जा रहा है. यह कितना भयावह है कि 60 फीसदी भूजल भंडार खाली हो गया है. यहां ऐसा नहीं होना चाहिए था. क्योंकि यहां जंगल है. पेड़ पौधे हैं. लेकिन, विकास के जिस मॉडल पर हम काम कर रहे हैं, वह विनाश वाला है.
युवाओं की सिविल सोसाइटी अबुआ अधिकार मंच के द्वारा रांची के होटल बीएनआर चाणक्या में आयोजित ‘पर्यावरणीय संकट और अंतर्दृष्टि विषय’ पर वे बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे.
उन्होंने कहा, “हम संविधान की अवहेलना कर रहे हैं. संविधान में भूमि को जीवंत रखने की जिम्मेदारी दी गयी है. हम प्रकृति का संरक्षण नहीं कर रहे हैं. हम विकास के सनातन मॉडल को भूल जा रहे हैं. इसका नुकसान हो रहा है.”
जलपुरूष ने झारखंड में पर्यावरण संकट और चुनौतियों तथा समाधान पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने डेटा आधारित और चित्रों पर बनी एक प्रेजेंटेशन के माध्यम से बताया कि कैसे राजस्थान में जल संकट की चुनौतियों की तस्वीर बदली गई.
प्रकृति को हम क्या देते हैं
उन्होंने कहा कि प्रकृति सिर्फ देती है यही मान कर इंसान चलता जाता है. हम प्रकृति को क्या देते हैं, इसे भूल जाते हैं. पर्यावरण को संरक्षित करने से ही जल बचेगा. पानी मिलेगा, वर्ना मुश्किलें एक दिन भयावह होगी, और तब कोई इस संकट से तत्काल उबार नहीं सकता. प्रकृति और योग की संस्कृति को अपग्रेड करने की जरूरत है.
वर्षा का पानी रोकना ही होगा
जलपुरूष ने कहा कि बारिश का पानी रोकना ही होगा. इसके लिए उपर बांध बनाने होंगे. वहीं के मिट्टी और पत्थरों से. पानी पंचायतों का गठन हो, ताकि पानी नदियों में और फिर खेतों में पहुंचे. जलपुरूष ने कहा कि बिना किसी सरकारी सहायता के उन्होंने अपने दम पर 15, 800 बांधों का निर्माण किया. राजस्थान के कई इलाके आज पानदार, इज्जतदार और मालदार हो गए हैं. यह सब करने के लिए पागल बनना पड़ता है. पागल मतलब काम के प्रति, जुनून के प्रति। अभियान को आंदोलन का रूप देना होगा. किसी सरकार और गुरु के भरोसे रहकर आप कैसे इतनी बड़ी चुनौती से निकलेंगे, जहां डेवपेलपमेंट की बात हो और प्रकृति की नहीं.
इकोनॉमी इन्फ्रास्ट्रक्चर के आधार पर नहीं
जलपुरूष ने कहा कि सिर्फ आर्थिक आधारभूत संरचना को केंद्र में रखने से इन चुनौतियों को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता. विकास और विनाश के बीच महीन फासला को समझना होगा. उसे पाटना होगा. जल प्रबंधन और प्रकृति की बात करनी होगी. उन्होंने सेमिनार में मौजूद लोगों से साझा संवाद भी किया. अबुआ अधिकार मंच के प्रयास की सराहना की.
इन शख्सियतों ने भी विचार रखे
सेमिनार को रामकृष्ण आश्रम रांची के सचिव स्वामी भवेशानंद महाराज जी, इंटरनेशनल काउंसिल आफ कंसल्टेंट्स झारखंड चैप्टर के अध्यक्ष तथा मेकनन के पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर पीके दीक्षित जी युवा पर्यावरण विद् निरंजन भारद्वाज, इंपीरियल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त प्रकाश कुमार, डीएसपीएमयू रांची के कुलपति प्रोफेसर डॉक्टर राजीव मनोहर रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर डॉक्टर सरोज शर्मा, रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉक्टर तपन शांडिल्य, वरिष्ठ पत्रकार मधुकर, समाजसेवी सत्यनारायण सिंह ने भी संबोधित किया.
कार्यक्रम में मुख्य तौर पर जिला परिषद की सदस्य अनुराधा मुंडा, जंगल बचाओ आंदोलन के अगुआ संजय बसु मलिक, आशुतोष गोस्वामी, सुनील यादव, विश्वास उरांव आदि शामिल थे. साथ ही अलग-अलग संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों, कॉलेजों के छात्र-छात्राएं, ग्राम पंचायत के प्रतिनिधि, जिला परिषद के सदस्य, नगर निगम के कई वार्ड पार्षद भी पर्यावरणविदों के विचार सुनने पहुंचे थे.
वेदांत कौस्ताव ने अपना मोटो बताया
इससे पहले मंच के संस्थपक वेदांत कौस्ताव ने इस सेमिनार के उद्देश्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अबुआ अधिकार मंच के कार्यों की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि हम सभी युवा उत्साहित और गर्वित हैं. विशेषज्ञों तथा पर्यावरणविदों के विचारों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. इससे पहले सभी अतिथियों को पौधे, स्मृति चिन्ह देकर और शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया गया.
सेमिनार में ही मंच के स्मारिका का लोकापर्ण अतिथियों द्वारा किय़ा. कार्यक्रम को सफल बनाने में मंच के अध्यक्ष, गौतम सिंह, नीतीश सिंह, किसलय, संजय लकरा, अभिषेक शुक्ला, पंकज तिवारी, अमित कुमार, विशाल यादव, नीरज कुमार राम, कुमारी अंजना समेत कई पदाधिकारियों की सराहनीय भूमिका रही.
