रांचीः हेमंत सोरेन सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार का शनिवार देर रात गिरिडीह मे निधन हो गया है. वे गिरिडीह से जेएमएम के विधायक थे. सरकार में उच्च शिक्षा तकनीक मंत्री के साथ पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. सुदिव्य कुमार सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता के साथ कुशल संगठक और रणनीतिकार भी थे. दिशोम गुरुजी शिबू सोरेन ने ही सुदिव्य को पार्टी में लाया था. उन्हें गुरुजी का विश्वासी और प्रिय माना जाता था.
अस्सी के दशक के आखिरी में शिबू सोरेन गिरिडीह के दौरे पर थे. उनकी मुलाकात सुदिव्य कुमार से हुई. गुरुजी ने सुदिव्य के घर जाने की इच्छा जतायी. उधर गुरुजी की इच्छा पर घर में पकौड़ी चाय की व्यवस्था की गई थी. हालांकि सुदिव्य के परिवार में किसी का राजनीति से कोई वास्ता नहीं था. और उनके पिता समेत कई सदस्य सरकारी नौकरी में थे.
दिशोम गुरु जब सुदिव्य सोनू के घर पहुंचे, तो परिवार के लोगों ने स्वागत किया. गुरुजी ने आगे बढ़कर सुदिव्य के पिता के पैर छुए और हाथ थामकर कहा- “आपका बेटा मांग के ले जा रहे हैं, कुछ बना के देंगे.”
गुरुजी के इस व्यवहार और विश्वास पर उनके पिता कुछ कह नहीं सके. इसके बाद सुदिव्य झारखंड आंदोलन और झारखंड मुक्ति मोर्चा का हिस्सा बन गए. उन्होंने न सिर्फ संघर्ष किया, बल्कि पार्टी में भी अपनी जगह और पहचान बनाई. गुरुजी के राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव के दौरान भी वे एक मजबूत सिपाही की तरह खड़े रहे.
एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले सुदिव्य ने और अपनी लगन के बल पर राज्य कैबिनेट में मंत्री पद तक पहुंचे. वे लंबे समय तक झामुमो के गिरिडीह जिला अध्यक्ष भी रहे.
2014 में उन्हें गिरिडीह से झामुमो का टिकट दिया गया. लेकिन वे कम वोटों से हार गए. इसके बाद 2019 में उन्होंने जीत दर्ज की. इसके बाद 2024 में फिर जीते.
कल्पना सोरेन को गांडेय से उपचुनाव लड़ाने और जीत दर्ज करने में भी उनकी अहम भूमिका रही. इसके बाद 2024 के चुनाव में भी वे गिरिडीह के साथ गांडेय में भी चुनावी बिसात बिछाते रहे.
पार्टी में उन्हें एक कुशल संगठक के अलावा रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता था. लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में वे रणनीतिक गोटियां बिछाते थे. इस वजह से वे हेमंत सोरेन के भी नजीदीकी रहे.
लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर कभी इसे अपने ऊपर हावी नहीं देने किया कि वे पार्टी के रणनीतिकार होने के साथ सोरेन परिवार के विश्वासी भी हैं. सरकार की नीति, निर्णय में भी उनकी रायशुमारी काफी अहम मानी जाती थी.
सुदिव्य सोनू अक्सर कहते थे कि गुरुजी ने बिना कहे उनके पारिवारिक तनाव को भांप लिया था और उस दिन के बाद उनके पिता ने कभी उनके राजनीति में रहने पर सवाल नहीं उठाया.
