रांचीः झारखंड में ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने के लिए भाकपा (माले) की राज्य कमिटी ने हेमंत सोरेन सरकार से निर्णायक कदम उठाने की मांग की है.
पार्टी ने कहा है कि राज्य में पिछड़े वर्गों की आबादी के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय की दिशा में आवश्यक कदम है.
भाकपा (माले) के राज्य सचिव मनोज भक्त ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार को अपने पिछले कार्यकाल के दौरान झारखंड विधानसभा में पारित ‘झारखंड पदों एवं सेवाओं में रिक्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में नामांकन में आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022’ के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता को फिर से मजबूत करना चाहिए.
मनोज भक्त ने कहा: “झारखंड के ओबीसी समुदाय को उनका संवैधानिक हक दिलाने के लिए राज्य सरकार को इस विधेयक को बिना किसी देरी के फिर से पारित कराना चाहिए. इसके साथ ही, यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह विधेयक न्यायिक समीक्षा से सुरक्षित रहे और पूर्ण कानून का दर्जा प्राप्त करे. केंद्र सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह इस विधेयक को तत्काल संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करे.”
इसके साथ ही भाकपा (माले) ने हेमंत सरकार से मांग की है कि वह ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के लिए विधानसभा का सत्र बुलाए और इस प्रस्ताव को पारित कर, नौवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार पर प्रबल राजनीतिक दबाव बनाए.
भाकपा माले ने याद दिलाया कि इस विधेयक में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का प्रस्ताव था, जिसे विधानसभा ने ध्वनिमत से पारित किया था. तत्कालीन राज्यपाल ने इस विधेयक को स्वीकृति नहीं दी और इसे वापस कर दिया था. इससे सामाजिक न्याय के लिए महत्वपूर्ण पहलकदमी ठंडे बस्ते में चली गई.
उन्होंने आगे कहा कि नौवीं अनुसूची में शामिल करने से आरक्षण की सीमा 50% से अधिक होने पर भी कानूनी चुनौती से सुरक्षा मिलेगी, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के संदर्भ में आवश्यक है.
भाकपा माले ने आरोप लगाया कि ओबीसी आरक्षण के सवाल पर भाजपा का दोहरा चरित्र है. एक तरफ वह केंद्र में ओबीसी हितैषी होने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ झारखंड में उसने ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की पहल का विरोध किया और राज्यपाल के माध्यम से इसे बाधित करने का काम किया.
