रांचीः झारखंड की घाटशिला विधानसभा सीट पर उपचुनाव में बंपर वोटिंग हुई है. 2.56 लाख मतदाताओं में से 73.88 ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है. ये आंकड़े शाम पांच बजे तक के हैं. अंतिम समय में यह आंकड़ा बढ़ा सकता है.
बंपर वोटिंग में महिलाओं युवाओं और बुजुर्गों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया है. ग्रामीण इलाकों में वोटरों की दिन भर लंबी कतारें देखी गयी. कहीं से कोई अप्रिय घटना की सूचना नहीं है.
राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के रविकुमार ने वोटिंग को लेकर बताया है कि शाम पांच बजे तक 73.88 प्रतिशत वोट पड़े हैं. अंतिम समय में यह बढ़ सकता है.
घाटशिला का उपचुनाव सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और मुख्य विपक्ष भारतीय जनता पार्टी के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बना है. वोटों की गिनती 14 नवंबर को होगी. जाहिर तौर पर घाटशिला में किसका परचम लहरेगा, इसे लेकर अब अगर- मगर और दावे- प्रतिदावे, कयासों का दौर शुरू हैं.
दलों के रणनीतिकार कार्यकर्ताओं से फीड लेने में जुटे हैं. लेकिन वोटिंग ट्रेंड साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार सोमेश चंद्र सोरेन और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन के बीच बिल्कुल आमने- सामने की लड़ाई है. कह सकते हैं एकतरफा या बड़े मार्जिन से किसी की जीत होती नहीं दिख रही.

जेएमएम-बीजेपी की दावेदारी
घाटशिला में झारखंड मुक्ति मोर्चा को अपने आदिवासी वोट बैंक और सांगठनिक मजबूती के फायदे का पक्का भरोसा है. दल के रणनीतिकार इसी गणित और फैक्टर को लेकर जीत के प्रति आशान्वित हैं. जेएमएम उम्मीदवार सोमेश चंद्र सोरेन का बॉडी लैंग्वेज भी जीत को लेकर इत्मिनान सा दिखता है. यानी बहुत घबराहट, तनाव में नहीं दिख रहे. दूसरी तरफ बीजेपी उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन को भी जीत का भरोसा है.
वैसे मतदान खत्म होने के बाद बीजेपी ने भी घाटशिला में जीत की दावेदारी कर दी है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने रांची में मीडिया से बातचीत में कहा है कि घाटशिला का परिणाम चौंकाने वाला और बीजेपी के पक्ष में होगा.

जेएलकेएम का क्या होगा
इस उपचुनाव में तीसरा कोण बनाने की आखिरी वक्त तक पुरजोर कोशिश करते रहे झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के उम्मीदवार रामदास मुर्मू की नैया भंवर में बुरी तरह फंस गई दिखती है. हालांकि जेएलकेएम के लिए इस चुनाव में खोने के लिए कुछ नहीं है. अगर रामदास मुर्मू ने 10 हजार वोट भी हासिल कर लिए तो कैंची छाप की बल्ले- बल्ले ही रहेगी. जयराम को भरोसा है कि कुरमी वोट रामदास के नाम ही जायेगा. और सबकी निगाहें इसी आंकड़े पर है. देखा यह भी जाना है कि कैंची की धार किसकी पतलून टाइट और किसकी पतलून ढीली करती है. या खुद चोटिल होती है.
जेएमएम का गढ़ रहा है
घाटशिला विधानसभा सीट जमशेदपुर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है. आदिवासियों के लिए रिजर्व इस सीट पर 13 उम्मीदवारर मैदान में हैं. झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक और हेमंत सोरेन सरकार में शिक्षा मंत्री रहे रामदास सोरेन के निधन से यहां उपचुनाव हुआ है.
रामदास सोरेन इस सीट से तीन बार चुनाव जीते थे. और घाटशिला को जेएमएम के गढ़ के तौर पर देखा जाता है. सत्तारूढ़ दलों की भारी- भरकम नाव पर सहानुभूति की पतवार के साथ सवार सोमेश चंद्र सोरेन की इस बार बीजेपी ने आखिरी वक्त तक चौतरफा घेराबंदी कर रखी थी.
चंपाई सोरेन की साख
बीजेपी उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पुत्र हैं. 2024 का चुनाव भी बाबूलाल सोरेन ही लड़े थे और रामदास सोरेन से 23 हजार वोटों से हार गए थे. इस बार बाबूलाल सोरेन की जीत तय करने के लिए सबसे ज्यादा चंपाई सोरेन ने पसीना बहाया है. लंबे समय तक झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता रहे चंपाई सोरेन जेएमएम के दांव- पेच से वाकिफ और चौकस थे. लिहाजा वे आदिवासी वोटों के तार जोड़ने के लिए अखिरी वक्त तक जुटे रहे थे.
ओबीसी, बांग्ला और ओडियाभाषी वोटरों के फैक्टर पर भी बीजेपी के रणनीतिकारों ने खासी मेहनत की थी. जमशेदपुर के बीजेपी सांसद विद्युवरण महतो की सीधी नजर ओबीसी वोटों को साधने पर लगी रही.
बीजेपी की इन रणनीति का अहसास झारखंड मुक्ति मोर्चा कुनबा को भी हो गया था. तभी जेएमएम के कम से कम 40 नेता, जिनमें मंत्री, सांसद, विधायक, पूर्व विधायक शामिल रहे, वोटों के समीकरण को टूटने से बचाने के लिए पूरे क्षेत्र में सतर्क रहे. हेमंत सोरेन और आखिरी वक्त में कल्पना सोरेन ने धुआंधार प्रचार किया. झारखंड मुक्ति मोर्चा के निचले संगठन को ठोंक-ठठाकर मोर्चे पर भिड़ा दिया गया.

सत्ता के अंक गणित पर
लब्बोलुआब यह कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने उपचुनाव जीतने और आदिवासी लोगों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं विपक्षी भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर कब्जाकर सरकार की साख कम करने की कोशिश में जोर लगाया है.
वैसे घाटशिला उपचुनाव का नतीजा सत्ता के अंकगणित पर कोई बड़ा उलटफेर नहीं करने वाला. क्योंकि 81 सदस्यीय राज्य विधानसभा में झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास फिलहाल 55 विधायक हैं जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के पास 24 विधायक हैं.
लेकिन पॉलिटिकल परस्पेशन के लिहाज से यह उपचुनाव बेहद संवेदनशील है. बीजेपी ने पूरे चुनाव झामुमो की सरकार की विफलता को गिनाया है. दूसरी तरफ हेमंत सोरेन और जेएमएम के नेता जोर देकर कहते रहे कि हमारी सरकार ही राज्य का कल्याण कर रही और आदिवासी- मूलवासी की हितैषी है.
दूसरा जो महत्वपूर्ण है कि यह उपचुनाव आदिवासी इलाकों में भी जेएमएम- बीजेपी की वजूद को लेकर लिटमस टेस्ट होगा. दरअसल 2024 के चुनाव में राज्य में आदिवासियों के लिए रिजर्व 28 सीटों में से 27 पर जेएमएम गठबंधन ने जीत हासिल की है. इससे पहले 2019 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी को आदिवासी इलाके में बड़े सेटबैक का सामना करना पड़ा था जबकि आदिवासी इलाकों में निर्णायक जीत के साथ हेमंत सोरेन सत्ता पर काबिज हुए थे.
बहरहाल, 14 नवंबर को सबकुछ साफ हो जायेगा. नतीजे के बाद राजनीति की दिशा और दशा बदलेगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
