तारीख- 28 नवंबर 2024. जगह- रांची का मोराबादी मैदान. झारखंड के 14वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले हेमंत सोरेन उत्साह और आत्म विश्वास से लबरेज नजर आ रहे थे. तब हेमंत सोरेन ने अपनी इस नई पारी को ‘अबुआ सरकार’ यानी अपनी सरकार बताया था. पांच दिसंबर को मंत्रिमंडल विस्तार के वक्त भी हेमंत सोरेन आत्मविश्वास में दिख रहे थे. उन्होंने कहा था कि सरकार तेज गति से काम करेगी. शुक्रवार, 28 नवंबर 2025 को हेमंत सोरेन सरकार के कार्यकाल का एक साल पूरा हो रहा है. पूछा जा सकता है कि ‘अबुआ सरकार’ की छवि स्थापित करने में हेमंत सरकार किस गति से काम कर रही है. और उनके सामने चुनौतियां क्या हैं.
चुनावों से पहले किए वादे, घोषणा की सतही चर्चा करने से पहले यह बताना प्रासंगिक होगा कि 2024 के विधानसभा चुनाव में हेमंत सोरन की अगुवाई में इंडिया ब्लॉक ने 56 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की है. 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 41 है. झारखंड के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका रहा, जब किसी गठबंधन को इतना शानदार जनादेश मिला.
जाहिर तौर पर हेमंत सरकार के सामने इस जनादेश का विश्वास जीतना चुनौती भरा है.
चुनाव से पहले 5 नवंबर 2024 को इंडिया ब्ल़ॉक ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और हेमंत सोरेन की अगुवाई में ‘एक वोट सात गांरटी’ के नाम से साझा घोषणा पत्र जारी किया था.
सरना कोड, आरक्षण और स्थानीयता
इंडिया ब्लॉक ने आदिवासियों के लिए सरना कोड लागू कराने और अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति तथा पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ाने तथा 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति लागू कराने की गांरटी की है. गौरतलब है कि ये तीनों मुद्दे संवेदनशील रहने के साथ सियासत के केंद्र में रहे हैं.
साथ ही झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पिछले चुनावों में भी इन मुद्दे को अपने वादे में शामिल किए थे. सरना कोड के अलावा हेमंत सोरेन की सरकार ने पहले ही स्थानीयता से संबंधित विधेयक और एसटी, एसी ओबीसी का आरक्षण बढ़ाने का विधेयक भी केंद्र सरकार को भेजा है. अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला है.
किसान कल्याण, खाद्य सुरक्षा और शिक्षा की गारंटी
इंडिया ब्लॉक की गारंटी में प्रति व्यक्ति सात किलो राशन देने और हर गरीब परिवार को साढ़े चार सौ रुपए में गैस सिलेंडर देने का वादा किया था.
इसके अलावा धान की एमएसपी को 2400 रुपए से बढ़ाकर 3200 रुपए करने का वादा किया गया. ये गारंटी लटकी पड़ी है. झारखंड के दस लाख युवाओं को नौकरी, रोजगार देने और 15 लाख तक पारिवारिक स्वास्थ्य बीमा का लाभ देने का वादा भी आधा-अधूरा पड़ा है. जेएमएम गठबंधन की सरकार को पहले से ही इन सवालों पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.
मंईयां सम्मान की गारंटी के तहत हेमंत सोरेन सरकार सरकार 18 से 50 साल तक की लगभग 50 लाख महिलाओं को ढाई हजार रुपये की सहायता उनके खाते में भेज रही है. कह सकते हैं कि एक साल की सरकार मईंया सम्मान योजना से आगे बढ़कर कोई बड़ी लकीर खींचने में कामयाब नहीं हो सकी है.

शासन का इकबाल कायम करना
हेमंत सोरेन के दोबारा सत्ता में काबिज होने के बाद से ही शासन के इकबाल और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इनमें लॉ एंड ऑर्डर को दुरूस्त करना, अवैध माइनिंग खासकर बालू और कोयले की चोरी को रोकना और अधिकारियों, कर्मचारियों को निचले से शीर्ष स्तर पर जनता के बीच जवाबदेह बनाना और कथित तौर पर करप्शन को रोकने और ट्रांसफर- पोस्टिंग को पारदर्शी बनाने का मामला अहम रहा है.
पिछली सरकार के कार्यकाल में राज्य के कई आला अधिकारियों और इंजीनियरों को करप्शन और खासकर मनी लांड्रिंग से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था। जबकि 2024 के मई महीने में ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को भी प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था. इसके बाद आलम को इस्तीफा देना पड़ा. अभी भी वे जेल में हैं.
इस साल राज्य सरकार की जांच एजेंसी एंटी करप्शन ब्यूरो ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे समेत कई कारोबारी और शराब के धंधे में शामिल चेहरे को गिरफ्तार किया है. शराब घोटाले और हजारीबाग में वन भूमि घोटाले में एसीबी की कार्रवाई के बाद से शासन के इकबाल पर विपक्ष की ओर से लगतार सवाल खड़े किए जाते रहे हैं.
वैसे भी झारखंड में चाहे सरकारें जिसकी रही, कथित तौर पर नौकरशाही सत्ता में हावी रही है. हेमंत सोरेन के सामने ये चुनौती कायम है कि वे सिस्टम को आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाएं.
इसके साथ ही अलग- अलग क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स के साथ रायशुमारी के बाद विजन और डाक्यूमेंट्स बेस्ड तथा टाइम बाउंड काम की चुनौती भी सरकार के सामने है. स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, शिक्षा के क्षेत्र में साल भर के दौरान कोई आमूलचूल बदलाव होता नहीं दिखता.
वित्तीय प्रबंधन के मोर्चे पर
हेमंत सरकार के लिए वित्तीय प्रबंधन के मोर्चे पर राज्य को मजबूत बनाने की अहम चुनौती बढ़ती जा रही है. विकास की कई अहम योजनाएं वित्तीय भार और केंद्रीय सहायता की आस में प्रभावित हो रही हैं. मुख्यमंत्री मईंयां सम्मान योजना, 200 यूनिट बिजली मुफ्त करने से खजाने पर बड़ा बोझ पड़ा है. जल-नल योजना बीच राह में लटकी पड़ी है. अलग- अलग विभागों में बड़े पैमाने पर ठेकेदारों के पैसे बकाये रहने से विकास की रफ्तार धीमी दिख रही है. ग्रामीण विकास की नयी योजनाओं पर काम होता नहीं दिख रहा.
सरकार के सामने राजस्व संग्रह बढ़ाने तथा समय पर केंद्रीय सहायता प्राप्त करने की भी चुनौतियां कायम है. लाखों छात्रों को साल- डेढ़ साल से स्टाइपेंड नहीं मिला है. इसे लेकर सरकार की आलोचना हो रही है.
हालांकि हेमंत सोरेन की इस ओर सीधी नजर है. हेमंत सोरेन ने राजस्व संग्रहण बढ़ाने के लिए सभी विभागों को एक्शन प्लान बनाने का निर्देश दिया है. इसके साथ ही स्थापना व्यय को नियंत्रित करने को कहा है.
उन्होंने अधिकारियों से यह भी कहा है कि विभिन्न कंपनियों और उद्योग समूहों से बातचीत कर राजस्व राजस्व बढ़ोतरी की संभावनाएं तलाशे जाएं.
किसान कल्याण, खाद्य सुरक्षा और शिक्षा की गारंटी
राज्य की 75 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। कृषि उत्पादन को बढ़ाने और बाजार मुहैया करने के लिए सरकान को नवाचार प्रयोग करने होंगे।
नीति आयोग ने बहुआयामी गरीबी सूचकांक द्वारा झारखंड को भारत के दूसरे सबसे गरीब राज्य के रूप में वर्गीकृत किया गया है। अभी भी इसकी अधिकांश ग्रामीण आबादी स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच के बिना रह रही है। नीति आयोग के अनुसार, बहुआयामी ग्रामीण गरीबी दर 2015-16 में 50.92 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 34.93 प्रतिशत हो गई है, फिर भी कई परिवार अभी भी आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हैं और सरकारी योजनाओं और लाभों तक उनकी पहुंच नहीं है. लिहाजा इन सेक्टर में आमूलचूल बदलाव और प्रतिबद्धता के साथ काम करना सरकार की चुनौती बनी है.
राज्य में व्यापक कुपोषण को दूर करने के लिए आंगनबाड़ियों और स्कूलों में मिड डे मील में सभी बच्चों को अंडा देने के साथ महिला आय़ोग, मानव अधिकार आयोग और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कारगर कदम उठाने बाकी हैं.

नौकरी, रोजगार और पारदर्शी परीक्षाएं
2019 में भी हेमंत सोरेन ने नौकरी, रोजगार के सवाल पर युवाओं से कई अहम वादे किए थे. लेकिन नियुक्तियों, रोजगार, वेकैंसी और पारदर्शी प्रतियोगिता परीक्षाओं को लेकर युवाओं के बीच हताशा और निराशा के स्वर सुनाई पड़ते रहे हैं.
राज्य में सरकारी विभागों में करीब दो लाख पद खाली हैं. इन पदों को भरे जाने की बड़ी चुनौती सरकार के सामने है. इनके अलावा झारखंड लोकसेवा आयोग और झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग को प्रभावी बनाने के लिए भी सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे. हालांकि पेपर लीक को लेकर सरकार ने सख्त कानून बनाया है और भर्तियों को लेकर कई नियुक्ति नियमावली में भी बदलाव किए हैं. लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए, इसके लिए अलग- अलग स्तरों पर व्यवस्था में बदलाव निहायत जरूरी है.
तमाम सवाल और जद्दोजहद के बाद झारखंड लोकसेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी आयोग ने परीक्षाओं का कैलेंडर तो जारी किया, लेकन वे कैलेंडर फेल होते दिख रहे हैं. अलबत्ता अब तो स्कूली परीक्षाएं छह महीने लेट हो गयी हैं.
पेसा और अबुआ आवास
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार )अधिनियम 1996 को लागू कराने की चुनौती सरकार के सामने कायम है. झारखंड हाइकोर्ट ने पेसा कानून अब तक लागू नहीं किए जाने पर सख्त रुख दिखाया है. पेसा को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य में बालू घाटों की नीलामी के बाद आंवटन रोकने का आदेश दिया है और कहा है कि पेसा लागू करने के बाद ही सरकार बालू घाट आवंटन कर सकेगी.
भूमिहीन, दलित और विस्थापितों के आवासीय और जाति प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया को सरल करने, वनाधिकार और सामुदायिक पट्टे के अलावा विस्थापन, पलायन जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार के काम जमीन पर नहीं दिखते.
हेमंत सोरेन सरकार ने अबुआ आवास योजना के तहत चार साल में बीस लाख लोगों को तीन कमरो का पक्का मकान देने की योजना शुरू की है. इस योजना को गति मिले और लक्ष्य हासिल किए जा सकें, इसके लिए योजना में पारदर्शिता के साथ गति देने की चुनौती को अगर सरकार पीछे छोड़ती है, तो बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिना जाएगा.
