सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में भेदभाव को रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की ओर से जारी नए नियमों पर गुरुवार को रोक लगा दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026’ के प्रावधानों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका है.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इन नियमों को दोबारा ड्राफ़्ट करने के लिए कहा है. तब तक इन नियमों के लागू होने पर रोक रहेगी.
इससे पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची की बेंच ने गुरुवार को कहा कि अगर कोर्ट दखल नहीं देता है, तो इसके खतरनाक नतीजे होंगे और इससे समाज में बंटवारा होगा.
इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि इन नियमों की जांच एक एक्सपर्ट कमेटी को करनी होगी.
कोर्ट ने कहा, “पहली नज़र में हम कहते हैं कि रेगुलेशन की भाषा अस्पष्ट है और एक्सपर्ट्स को इस भाषा को देखने की ज़रूरत है ताकि इसे बदला जा सके और इसका गलत इस्तेमाल न हो।”
इसलिए, खंडपीठ ने यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और आदेश दिया कि रेगुलेशन को अभी रोक दिया जाए.
उन्होंने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह अदालत को एक विशेषज्ञों की समिति का सुझाव दें, जो इस मुद्दे की जांच कर सके. प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यूजीसी को इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाख़िल करना चाहिए.
कोर्ट ने आदेश दिया, “19 मार्च को जवाब देने के लिए नोटिस जारी करें. सॉलिसिटर जेनरल ने नोटिस स्वीकार कर लिया है. चूंकि 2019 की याचिका में उठाए गए मुद्दे भी संवैधानिकता की जांच करते समय मायने रखेंगे… इसलिए इन याचिकाओं को भी उसी के साथ टैग किया जाए. इस बीच, यूजीसी रेगुलेशन 2026 लागू नहीं रहेंगे.”
अब इस मामले में अगली सुनवाई 19 फरवरी को होगी.
यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2026 (रेगुलेशन) 13 जनवरी को नोटिफाई किया गया था और यह भारत के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है. ये नियम इसी विषय पर 2012 में लागू किए गए नियमों की जगह जारी किए गए हैं.
इन रेगुलेशन को इस बात के लिए चुनौती दी गई है कि इसमें ‘जनरल कैटेगरी’ के छात्रों को इसकी शिकायत निवारण व्यवस्था के तहत शिकायत करने से बाहर रखा गया है.
यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि नए नियम कुछ समूहों को अलग-थलग करने वाले हैं.
