रांचीः झारखंड सरकार द्वारा पेसा की नियमावली अधिसूचित किए जाने के बाद आदिवासी संगठनों की बैठकें और चर्चा का दौर शुरू है. पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अगुआ पेसा की नियमावली पर आपत्ति जाहिर करते हुए इसमें आवश्यक और तत्काल सुधार पर जोर दे रहे हैं. स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधियों का कहना है कि नियमावली में पंचायत राज व्यवस्था और जिला प्रशासन को गैर जरूरी महत्व दिए गए हैं. यह ग्राम सभा की शक्तियों को कमजोर करने की कोशिश है.
रविवार, 11 दिसंबर को ‘परगना बाबा माझी बाबा’ एवं समाज के प्रतिनिधियों की देश परगना बाबा बैजू मुर्मू के अध्यक्षता में घाटशिला में हुई बैठक में पेसा की नियमावली पर विस्तार से चर्चा की गई. देश पारानिक बाबा, धाड़ दिशोम, दुर्गा चरन मुर्मू ने बताया है कि झारखंड अलग राज्य बनने के 25 साल बाद पेसा को लागू किए जाने से आदिवासियों में हर्ष का माहौल है, लेकिन पेसा नियमावली 2025 के प्रारूप पर गौर करने से पता चलता है कि नियमावली में आदिवासियों के कई अधिकार को गौण करते हुए ग्राम सभा कि शक्तियों को कम करने की कोशिशें की गई है. जबकि जिला प्रशासन तथा पंचायती राज व्यवस्था को गौर जरूरी महत्व दिए गए हैं.
उन्होंने बताया कि नियमावली में संशोधन करने के लिए देश पारगना बाबा के नेतृत्व में 10 सदस्यों का कमेटी गठित की गई है. संशोधन प्रारुप तैयार कर माझी पारगना माहाल पारंपरिक स्वसाशन व्यवस्था का प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल, मुख्यमंत्री, आदिवासी कल्याण मंत्री, पंचायती राज मंत्री सहित सचिवों से मुलाकात कर अपनी बात रखेंगे.

किन बातों पर है आपत्तियां
‘परगना बाबा माझी बाबा’ से जुड़े प्रदाधिकारी विमर्श के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह नियमावली पेसा 1996 का अनुरूप नहीं है. सामाजिक संसाधनों के प्रबंधन और नियंत्रण में भी ग्राम सभा को विभिन्न अधिनियम अथवा कानून को शर्तों के साथ थोपा गया है. परंपराओं का संरक्षण एवं विवादों का निपटारा में भी ग्राम सभा की शक्ति को न्यून किया गया है. ग्राम सभा को डीएमएफटी फंड एवं ट्राइबल सब प्लान में अधिकार नहीं दिये गए हैं. आदिवासी अगुआ को इस बात पर भी आपत्ति है कि हस्तांतरित भूमि की वापसी में ग्राम सभा के अंतिम निर्णय को स्थापित नहीं किया गया है. कब्जाधारी को न्यायालय जाने से रोका नहीं गया है.
दुर्गा चरन मुर्मु कहते हैं, “पेसा की नियमावली को धरातल पर उतारने से पहले जिला प्रशासन द्वारा असंवैधानिक रूप से गैर आदिवासियों को बनाए ग्राम प्रधानों को पद मुक्त किया जाए और पेसा नियमावली को पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में पूर्ण रूप से काम करने का अधिकार मिले, तभी स्वशासन का रास्ता प्रशस्त होगा.”
मुर्मू कहते हैं, बैठक में इसकी भी निंदा की गई कि कुछ लोग पेसा कानून नियमावली का विरोध करने के जो तरीके अपना रहे हैं, वह उलझन और विवाद बढ़ाने वाला है. पेसा नियामवली की कॉपी फाड़ना और अनर्गल बयान देना असंवैधानिक है. वेलोग, आदिवासियों को यह कानून शक्ति के रूप में मिले नहीं चाहते हैं.
बैठक में मुख्य रूप से तोरोप पारगना बाबा हरिपोदो मुर्मू, दसमत हांसदा, बैजू टुडू, पारगना आयो पुन्ता मुर्मू, पद्मावती हेंम्ब्रोम, लखन मार्डी, देश पारानिक दुर्गा चरन मुर्मू, जायरेत बिरेन टुडू, मार्शल मुर्मू, छोटा भुजांग टुडू, सत्रुघन मुर्मू, सुशांत हेंम्ब्रोम, सुकुमार सोरेन, कारु मुर्मू, जगदिश बास्के, गन्साराम टुडू, मानिक हांसदा, अधिपति मंडी, श्याम टुडू, बैधनाथ सोरेन, जितराई किस्कू, बिन्दे सोरेन, सुनाराम सोरेन, कामेश्वर सोरेन, रातुलाल टुडू, सुबोध हांसदा, सुनिल हेंम्ब्रोम, बिपिन चंद्र मुर्मू, बिर्जन मुर्मू, धार्मा मुर्मू, फागुलाल किस्कू आदि समाज के अन्य प्रतिनिधि उपस्थित थे.
