धनबादः देश के जाने-माने पर्यावरणविद् और मैगसेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष प्रो राजेंद्र सिंह ने कहा है कि जब भी कोई नदी सूखती है, तब वहां की सभ्यता बर्बाद हो जाती है. अपराध भी बढ़ जाता है. नदियों के आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है.
नदी की भूमि का अधिग्रहण विषय पर आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे और आखिरी दिन सोमवार को बतौर मुख्य वक्ता राजेंद्र सिंह ने कहा कि तीसरा विश्व युद्ध शायद जल की वजह से ही होगा.
उन्होंने कहा कि पहले दो राज्यों में सूखा पड़ता था. अब 17 राज्यों में पड़ रहा है. इसका मुख्य कारण अनियमित वर्षा का पैटर्न है. राजस्थान में अब भी सूखा होता और कहीं-कहीं बाढ़ भी आती है. ग्राउंडवाटर रिचार्ज की जबरदस्त कमी है. वर्षा जल को इकट्ठा कर बांध बनाने से राजस्थान की जल समस्या की स्थिति में बदलाव आई है. वहां नदियां पुर्नजीवित होने लगी हैं. अब तक 23 नदियां जीवित की जा चुकी हैं. नादियों के प्रवाह का अधिकार भारत सरकार के पास है, लेकिन बारिश के पानी पर अधिकार राज्य सरकार के पास है.
द्रोही माना जाता है
उन्होंने कहा, “आज जो जल की बात करते हैं, प्रकृति को भगवान मानते हैं, उन्हें व्यवस्था द्रोही माना जाता है. लोकतंत्र कारपोरेट और कांट्रैक्ट से चल रहा है. मिशन वाई नदी की जमीन की पहचान कर ग्रीन जोन, ब्लू जोन और रेड जोन में बांट लें. फसल का पैटर्न वर्षा के पैटर्न से जोड़ने से किसानों को लाभ मिलेगा.”
इस संगोष्ठी में आइआइटी आइएसएम, युगांतर भारती, दामोदर बचाओ आंदोलन, आइआइटी रूड़की, आइआइटी खड़गपुर, सीयूएसबी, सीयूजे, सिंफर, नीरी, आइआइटी बांबे, आइएफपी रांची, सीजीडब्ल्यूबी, सीएसआइआर, वन विभाग, एनडीआरसी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, आइसीएफईआर समेत कई संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया.
इनमें मिशन वाई के संयोजक प्रोफेसर अंशुमाली, जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और दामोदर बचाओ आंदोलन के अगुआ सरयू राय, पद्मश्री आरके सिन्हा, युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण, अरुण राय, उदय सिंह, सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा, धर्मजीत चौधरी, प्रमोद कुमार, अपर्णा, अपूर्वा, राहुल पांडेय मुख्य तौर पर उपस्थित थे.
