पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी निर्णायक और शनदार जीत की ओर है. यहां सत्तारूढ़ ममता बनर्जी का किला ढहता नजर आ रहा है.
पश्चिम बंगाल के परिणाम भारतीय राजनीति के इतिहास में नया अध्याय के तौर प जुड़ता दिख रहा है और इसके राजनीतिक मायने निकाले जाने लगे हैं.
ममता बनर्जी 15 सालों से सरकार चला रही थीं. और इस दौरान उनकी तृणमूल कांग्रेस पार्टी विपक्षी दलों के लिए बड़ी चुनौती बनी थी.
पश्चिम बंगाल में आज 294 में से 293 सीटों पर वोटों की गिनती हो रही है. बहुमत का आंकड़ा 148 है.
पल-पल बदलते रूझानों के बाद टीएमसी 95 सीटों पर और बीजेपी 193 सीटों पर आगे चल रही है. बीजेपी के लिए ये पहला मौक़ा है, जब वो राज्य में सरकार बनाने जा रही है.
2021 के चुनाव में बीजेपी 77 सीटें ही जीत सकी थी. लेकिन इस बार बंगाल के हर इलाके में बीजेपी का डंका बजता नजर आ रहा है.
बीजेपी को 2021 के विधानसभा चुनाव में में 38.1 प्रतिशत वोट मिले थे. इस बार बीजेपी का वोट शेयर 45 प्रतिशत के पार जाता दिख रहा है.
अधिकतर एकतरफा चुनाव
बीते करीब 50 साल से पश्चिम बंगाल में ज़्यादातर एकतरफ़ा चुनाव होते रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो चाहे कांग्रेस हो, लेफ़्ट हो या फिर टीएमसी, जिस भी पार्टी को जीत मिली, उसे भारी बहुमत भी हासिल हुआ.
दोनों प्रमुख पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व, उम्मीदवारों और राजनीतिक हस्तियों, चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने ऐसे कदम उठाए हैं जिन्होंने इस चुनाव को एक बिल्कुल नया शक्ल दिया है.
दो चरणों में हुए चुनाव के बाद अधिकतर एग्जिट पोल में बीजेपी की सरकार बनने का अनुमान बताया था. हालांकि ममता बनर्जी और टीएमसी को इन अनुमानों पर भरोसा नहीं था. लेकिन नतीजे बता रहे है कि सत्ता पर काबिज होने के लिए बीजेपी की तमाम कोशिशें और वोटों के समीकरणों को साधने के तिकड़म कामयाब होते नजर आ रहे हैं.
कांटे से कांटा निकालने की रणनीति
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में बीजेपी की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे पार्टी के बड़े रणनीतिकार अमित शाह के अलावा चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब, सुनील बंसल सरीखे नेताओं ने चुनावी अभियान और सांगठनिक मोर्चे पर पार्टी की रणनीति पर बेहतरीन तरीके से धार चढ़ायी.
अलबत्ता शाह पंद्रह दिनों तक पश्चिम बंगाल में डेरा डाले रहे. उन्होंने समन्वय किया और आवश्यक निर्देश दिए. रणनीति को ज़मीन पर उतारने के लिए लगातार संगठन की बैठकें कीं. वे
देर रात तक पार्टी नेताओं के साथ बैठक कर उन्हें गाइड करते थे और दिन में रैलियों और रोड शो के माध्यम से प्रचार करते थे. उन्होंने प बंगाल में पचास से भी अधिक रैलियां और रोड शो किए.
हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण
एसआइआर तो इस बार के चुनाव में एक अहम फैक्टर रहा ही, लेकिन बीजेपी को मिलती बड़ी जीत के संकेत यह भी हैं कि हिंदु वोटों के ध्रुनीकरण को लेकर पार्टी के रणनीतिकारों ने जो तरकीब लगायी, वह सिरे चढ़ती दिख रही है. दूसरी तरफ मुस्लिम वोटों को एक मुस्त अपवी तरफ खींचने में ममता बनर्जी को सफलता नहीं मिली है. हिंदुत्ववाद और राष्ट्रवाद का मुद्दा शुरुआती दौर से ही उछालना शुरू कर दिया था. साथ ही टीएमसी की कथित दंबगई, दादागिरी और सत्ता के बेजा इस्तेमाल के साथ महिलाओं की सुरक्षा जैसे मामले को भी बीजेपी ने पुरजोर उछाला.
