Ajay Sharma
पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर सुर्खियों में रहे कोचांग ने सात वर्षों में बड़ा बदलाव देखा है. आदिवासी बहुल खूंटी जिले में पहाड़ों की गोद में बसा है कोचांग गांव. 25 फरवरी 2018 को यहां पत्थलगड़ी की गूंज उठी थी, तब यह आदिवासी इलाका राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया था. उस दिन कोचांग के चौराहे पर गाड़ा गया ‘पत्थल’ अब भी खामोशी से खड़ा है, जिस पर उकेरी गई पंक्ति — “जनादेश नहीं, बंधारण सर्वोपरि है, लोगों को उस दौर की याद दिलाती है.
पत्थलगड़ी के सात साल गुजरे. इन सबके बीच 21 सितंबर 2025 की तारीख कोचांग के लिए यादगार हो सकती है, बशर्ते ग्रामीणों ने विकास योजनाओं को लेकर जो मसौदा सरकार के नुमाइंदे और जनप्रतिनिधियों के बीच रखा है, वह जमीन पर उतर जाए.
21 सितंबर को खूंटी के सांसद कालीचरण मुंडा की पहल पर एक बड़ी बैठक हुई. इसमें सरकार के मंत्री राधाकृष्ण किशोर, कई नेता और ग्राम सभा के प्रतिनिधियों के साथ आसपास के गांवों को लोग मौजूद थे.
इन मौजूदगी की वजह से कोचांग की तस्वीर कुछ अलग थी. मैदान में एक बार फिर वही गीत गूंजे, वही पारंपरिक नृत्य हुए. वही भीड़ और वही वेष-भूषा नजर आई. हां, बड़ा फर्क यह था कि सात साल पहले कोचांग ने संविधान से ऊपर पत्थलगड़ी को प्राथमिकता दी थी, वही कोचांग लोकतांत्रिक जनादेश पर अपनी उम्मीदों के साथ मजबूती से भरोसा जता रहा है.
संघर्ष की धरती
आजादी से पहले हो या आजादी के 78 सालों बाद, इस इलाके ने हमेशा संघर्ष को ही जीवन का हिस्सा बनाया. नक्सलवाद, विवादित पत्थलगड़ी, अंधविश्वास, अशिक्षा और अफीम की खेती जैसी चुनौतियों के बीच ने लोग जीवन जीते कम और संघर्ष अधिक करते आए हैं. मुमकिन है कि सरकार के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने आदिवासियों के चेहरे को पढ़ने की कोशिशें की. राधा कृष्ण किशोर ने कहा “राज्य बनने के उद्देश्य अब तक पूरे नहीं हुए. झारखंड को समझना है, तो कोचांग के लोगों के चेहरे पढ़िए, सबकुछ साफ नजर आ जाएगा.”
विकास की राह में अड़चनें
दक्षिणी अड़की का यह इलाका अब भी समस्याओं के मकड़जाल में जकड़ा हुआ है. कुदादा:, तोतकोरा जैसे दर्जनों गांव आज भी सड़क से वंचित हैं. सरकारी स्कूलें लकड़ी की झोपड़ियों में चल रही हैं. नक्सलवाद और विवादित पत्थलगड़ी से बाहर निकलकर अब यहां के लोगों ने संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा जताया है, लेकिन विकास की असली राह अभी दूर लगती है.
कोचांग, प्रखंड मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र है, जहां लोगों की आजीविका का मुख्य साधन खेती-बारी है. ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के 78 वर्ष बाद भी क्षेत्र बेरोजगारी, पलायन, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है.

सरकार से उम्मीदें हजार
21 सितंबर 2025 को कोचांग पहुंचे मंत्रियों और नेताओं के सामने स्थानीय ग्रामसभा ने क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर मांगपत्र सौंपा. सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को जोर-शोर से रखा गया. ग्रामीणों ने आशा जताई है कि इस बार उनकी आवाज अनसुनी नहीं होगी और लंबे समय से अधूरी पड़ी मांगें पूरी होंगी.
संयुक्त ग्रामसभा ने कोचांग की बुनियादी समस्याओं और विकास योजनाओं को लेकर सरकार को एक मांग पत्र सौंपा है
संयुक्त ग्रामसभा की मुख्य मांगें
-स्वशासन व अधिकार: कोचांग पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है. ग्रामीणों ने पेसा कानून लागू कर गांव के हातु मुंडा को अधिकार हस्तांतरित करने की मांग की है, ताकि गांव का विकास सामूहिक रूप से हो सके.
-रोजगार व आजीविका: बेरोजगारी और पलायन रोकने के लिए बकरी, मुर्गी, सुअर और बत्तख पालन को बढ़ावा देने, लाह की खेती के लिए प्रशिक्षण दिलाने तथा मनरेगा के क्रियान्वयन को सरल बनाने की मांग की गई है.
-सड़क निर्माण: कोचांग से बांजीकुसूम तक 30 किमी लंबी चौड़ी सड़क बनाने की जरूरत बताई गई है. इसके अलावा दर्जनों ग्रामीण पथों के निर्माण और पीसीसी सड़क बनाने की मांग की गई है.
-स्वास्थ्य सुविधा: प्रखंड में अस्पताल निर्माण, एम्बुलेंस की व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की मांग पर जोर है.
-बिजली आपूर्ति: कई गांव-टोलों में अब तक बिजली नहीं पहुंची है. ग्रामसभा ने तोतकोरा, कुदादा, कुरिया, तोपगा, टुंटू, तुसुंगा, कसमार, लोंगा, डंगलोवा, ईचाहातू, आड़ाहातू, ससंगबेड़ा, साके और चलकद सहित सभी टोलों को बिजली से आच्छादित करने की मांग की है.
-सिंचाई सुविधा: बंकीलोर नाला पर चेक डैम और जिलिंगबुरू टिकुरा पर टंकी बनाकर लिफ्ट इरिगेशन की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग भी की गई है. इनके अलावा दर्जन भर ग्रामीण सड़कों के निर्माण की मांग भी रखी गयी है.
ग्रामसभा ने सरकार के नुमाइंदों से स्पष्ट कहा कि जब तक गांवों में बुनियादी सुविधायें नहीं पहुंचेगी, विकास की कल्पना बेमानी रहेगी. जाहिर तौर पर सबकी नजर इस ओर टिकी है कि सत्तारूढ़ नेताओं की चरणधूलि से सराबोर हुई कोचांग की धरती विकास से कब तक संपन्न और सुदृढ़ होगी.
