झारखंड में लंबे समय से पेसा (प्रोविजन ऑफ द पंचायत एक्सटेंशन टू द शेड्यूल एरिया एक्ट 1996) कानून लागू करने की मांग साकार हुई है. मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में पेसा नियमावली से जुड़े प्रस्ताव को मंजूरी दी गई.
कैबिनेट ने दो संशोधनों के साथ नियमावली पारित की है. इसके तहत एक राज्सव ग्राम को एक ग्रामसभा माना जाएगा. इसके अलावा पहले ग्राम सभा को दस हजार रुपए दंड देने का अधिकार था, उसे घटाकर दो हजार रुपए कर दिया गया है.
नियमावली के तहत योजनाएं ग्राम सभा के माध्यम से तय होंगी तथा गांव को सारे पारंपरिक अधिकार दिए जाएंगे.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि पेसा ड्राफ्ट को लेकर विभिन्न विभागों से मंतव्य हासिल करने के बाद प्रस्ताल को मंजूरी प्रदान कर दी गई है. अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन का अधिकार देने वाला यह अधिनियम झारखंड में जनजातीय आबादी के हक और अधिकार को सुनिश्चित कराने के साथ विकास का मार्ग भी प्रशस्त करेगा.
दरअसल, झारखंड अलग राज्य गठन के 25 साल बाद भी शेड्यूल एरिया के आदिवासी समुदायों को स्वशासन का अधिकार नहीं मिल पाया है। अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं के माध्यम से आदिवासी समुदायों को स्वशासन का अधिकार देने वाला यह अधिनियम (पेसा कानून) 1996 में लागू किया गया था। यह अधिनियम है- पेसा कानून (प्रोविजन ऑफ द पंचायत एक्सटेंशन टू द शेड्यूल एरिया एक्ट 1996) . यह कानून देश भर के पांचवी अनुसूची वाले आठ राज्यों में लागू हो चुका है.
शेड्यूल एरिया और पारंपरिक व्यवस्था
पांचवी अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्र में झारखंड के 14 जिले शामिल 2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में आदिवासियों की जनसंख्या कुल आबादी लगभग 3.29 करोड़ की 26.3 प्रतिशत है. इनमें से आधे से ज़्यादा लोग 12,164 गांवों में रहते हैं.
81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं। अनुसूचित क्षेत्रों में मानकी मुंडा व्यवस्था और माझी परगना व्यवस्था (पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था/ शासन प्रणाली) के 28,550 पदाधिकारियों को राज्य सरकार हर महीने सम्मान राशि देती है.
हाइकोर्ट का सख्त रुख
लंबे समय से पेसा (प्रोविजन ऑफ द पंचायत एक्सटेंशन टू द शेड्यूल एरिया एक्ट 1996) कानून लागू करने की मांग को लेकर हाइकोर्ट में याचिका दायर की गई थी. कोर्ट ने पूर्व में ही सरकार को पेसा कानून लागू करने के आदेश दिए थे. इसकाक अनुपालन नहीं होने पर कोर्ट ने पेसा के तहत नियमावली को लेकर अवमानना से जुड़े एक याचिका में सुनवाई करते हुए रेत घाटों और लघु खनिजों के आवंटन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है.
हाल ही में अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि कब तक इसे कैबिनेट से मंजूरी मिलेगी. कोर्ट ने यह भी कहा कि बालू घाटों के आवंटन पर रोक जारी रहेगी.
आंदोलन भी हुए थे
झारखंड में पेसा कानून लागू करने की मांग को लेकर पिछले जून महीने में आदिवासी समाज के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, सरना धर्मावलंबी के लोगों ने आदिवासी रूढ़ि सुरक्षा मंच के बैनर तले राजभवन मार्च किया था. दूसरे आदिवासी इलाकों में इस सवाल पर आंदोलन, बैठकें होती रही है।
आदिवासी प्रतिनिधि इन बातों पर जोर देते रहे हैं कि पेसा कानून 1996 में अनुसूचित क्षेत्रों के स्वशासन, संस्कृति, पहचान और संसाधनों की रक्षा को लेकर पारित किया गया था. लेकिन, झारखंड में इसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया है. जबकि, पूर्ववर्ती सरकार द्वारा नियमावली का मसौदा तैयार किया गया था. पेसा लागू नहीं होने से आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकार कमजोर हो रहे हैं.
