झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, आंदोलनकारी, दिशोम गुरू शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा.
उन्हें लोक कल्याण के क्षेत्र में काम करने के लिए यह सम्मान मिल रहा है.
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री विजेताओं के नामों की घोषणा की.
गृह मंत्रालय की ओर से जारी पद्म पुरस्कारों की लिस्ट में 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री पुरस्कार शामिल हैं.
भारतीय राजनीति में लंबी पारी खेलने वाले झारखंड आंदोलन के पुरोधा, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन का पिछले साल चार अगस्त को 81 साल की उम्र में निधन हो गया था.
वे झारखंड में तीन बार मुख्यमंत्री रहे. और केंद्र में भी तीन बार मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली.
अभी उनके पुत्र हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्य़मंत्री हैं. साथ ही वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष भी है.
शिबू सोरेन के निधन के बाद पार्टी में उन्हें भारत रत्न देने की मांग उठती रही है.
पिछले साल 28 अगस्त को झारखंड विधानसभा में दिशोम गुरू शिबू सोरेन को भारत रत्न देने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर केंद्र को भेजा गया है.
कर्ममभूमि और आदिवासी चेतना के पर्याय
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था.
अलग राज्य से लेकर आदिवासी के हूकूक की लंबी लड़ाई लड़े शिबू सोरेन ने राजनीतिक जीवन में कई झंझावात भी देखे. कई दफा जेल गए, पर और तपकर निकले.
उनके पिता सोबरन सोरेन शिक्षक थे. महाजनों के द्वारा उनकी हत्या के बाद शिबू सोरेन पढ़ाई छोड़कर गांव आ गये. उन्होंने आदिवासी समाज को एकजुट करना शुरू किया. महाजनी प्रथा और नशा के खिलाफ भी उन्होंने लंबा आंदोलन किया.
1973 में उन्होंने जेएमएम का गठन किया. झारखंड अलग राज्य की लड़ाई के भी वे पुरोधा बनकर उभरे. राजनीति में भी उन्होंने तमाम उतार-चढ़ाव का सामना किया और झारखंड मुक्ति मोर्चा के सर्वमान्य नेता के तौर पर हमेशा स्वीकार्य रहे.
दुमका संसदीय क्षेत्र से उन्होंने आठ बार चुनाव जीता. अभी वे राज्य सभा के सदस्य थे.संथालपरगना में आदिवासियों के बीच शिबू सोरेन ने अटूट लोकप्रियता हासिल की.
आदिवासियों के उत्थान और स्वाभिमान के लिए भी शिबू सोरेन ने महत्वपू्ण योगदान किया है. भारतीय राजनीति, आदिवासी समुदाय में शिबू सोरेन को सिर्फ एक मजबूत राजनीतिक हस्ताक्षर अथवा लीडर नहीं, आदिवासी चेतना, संघर्ष और आंदोलन के पर्याय के तौर पर जाना जाता है.
