रांचीः झारखंड विधानसभा में बजट सत्र के अंतिम दिन बुधवार को प्रश्न काल की कार्यवाही सदन में शांतिपूर्ण ढंग से चली. बजट सत्र के अंतिम दिन सदन ने वीबी-जी-राम जी जी के बदले मनरेगा योजना को ही जारी रखने का संकल्प पारित किया. अब इसे केंद्र सरकार को भेजा जाएगा.
इससे पहले झारखंड की ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने यह संकल्प लाया. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित अधिनियम झारखंड सरकार के साथ साथ यहां की ग्रामीण जरुरतों के लिहाज से सही नहीं है.
उनके प्रस्ताव पर स्पीकर रबींद्र नाथ महतो ने गैर सरकारी संकल्प की प्रक्रिया शुरु करने से ठीक पहले वोटिंग कराई जो ध्वनिमत से पारित हो गई.
मंत्रीने कहा कि मनरेगा अधिनियम, 2005 के मूल स्वरूप से किसी तरह की छेड़छाड़ ना की जाए.
महात्मा गांधी का नाम योजना से हटाना उस दर्शन को कमजोर करता है जो अंतिम व्यक्ति के उत्थान की बात करता है. योजना का नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी ही रखना चाहिए.
मंत्री ने सदन में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित “विकसित भारत – गारंटी फार रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) – विबी-जी राम जी दरअसल मनरेगा को कमजोर करने की दिशा में एक गंभीर कदम है, जो न केवल ग्रामीण गरीबों के रोजगार के अधिकार को प्रभावित करेगा बल्कि उनकी मजदूरी सुरक्षा और ग्राम सभाओं की संवैधानिक भूमिका को भी कमजोर करने का प्रयास है.
मंत्री ने कहा कि वर्तमान में मनरेगा के तहत अकुशल मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करती है. नये अधिनियम में केंद्र और राज्य वित्तीय पोषण अनुपात को 60:40 करना संघीय ढांचे के खिलाफ है जो झारखंड जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य पर असहनीय वित्तीय बोझ डालेगा. केंद्र सरकार को पूर्ववत वित्त पोषण जारी रखना चाहिए.
उन्होंने कहा कि मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों के जीवनयापन, सम्मान और सुरक्षा की गारंटी है. ऐसे में इसके स्थान पर किसी नई व्यवस्था को लागू करना, बिना राज्यों की सहमति और व्यापक विचार-विमर्श के, लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है.
मंत्री ने सदन को अवगत कराया कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रोजगार की कानूनी गारंटी कमजोर होने का खतरा है, मजदूरी भुगतान और कार्य दिवसों की निरंतरता प्रभावित हो सकती है, और राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने की आशंका है.
दीपिका पांडेय सिंह ने केंद्र सरकार से मांग की कि मनरेगा के मौजूदा ढांचे को पूरी तरगारंटीह सुरक्षित रखा जाए और इसे और सशक्त करते हुए 100 दिनों की जगह कम से कम 150 दिनों के रोजगार की दी जाए, ताकि ग्रामीण परिवारों को स्थायी आर्थिक सुरक्षा मिल सके और मजबूरी में होने वाले पलायन को रोका जा सके.
