रांचीः कई मौके पर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों और निर्णयों की कटु आलोचना करने वाले देश के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने ब्रिक्स सम्मेलन को सफल बताया है. साथ ही सम्मेलन की मेजबानी कर रहे भारत की भूमिका की तारीफ की है.
समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में यशवंत सिन्हा ने ब्रिक्स सम्मेलन को सफल और भारत की अच्छी कूटनीतिक भूमिका की मुख्य तौर पर तीन वजहें गिनाते हुए कहा, ‘इस सम्मेलन को सफल इसलिए माना जाएगा, क्योंकि जितने राष्ट्राध्यक्षों को निमंत्रण दिया गया था, वे सभी लोग आए. रूस से पुतिन आए, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आए, जिनको लेकर आशंका रहती थी कि आएंगे या नहीं, वह भी आए. वे पहली सफलता इसी को मानते हैं.
सिन्हा ने कहा, “दूसरी सफलता यह है कि मीटिंग होने के बाद कल शाम को साझा घोषणापत्र जारी हुआ. जब मई महीने में दिल्ली में विदेश मंत्रियों की मुलाकात हुई थी तो साझा बयान नहीं हो पाया क्योंकि इतने मतभेद थे. लेकिन इस बात हमको लगता है कि पदाधिकारियों ने कड़ी मशक्कत की और सर्वसम्मति से साझा बयान जारी हुआ.”
तीसरा- “यह कि जब इस तरह के सम्मेलन होते हैं तो द्वीपक्षीय वार्ताएं होती हैं। सब लोगों के साथ द्वपीक्षीय बैठकें हुईं. सबसे महत्वपूर्ण शी जिनपिंग के साथ हुई.”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने चीन के सामने खुलकर अपनी बातें रखीं, जिसकी वजह से शी जिनपिंग के नाराज होने की खबरें हैं.

ईरान पर स्टैंड को सराहा
पूर्व विदेश मंत्री ने ईरान को लेकर भारत के स्टैंड को भी सराहा है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार का स्टैंड बदलता हुआ दिखा था, लेकिन अब पुराने रुख पर आ गए हैं.
उन्होंने कहा, “ब्रिक्स में ईरान के राष्ट्रपति आए. इतने महत्वपूर्ण लोगों के बीच में होने के बावजूद उनका काफी प्रभाव देखने को मिला इस सम्मेलन में जो मैं मानता हूं कि बहुत अच्छी बात है. जब इजरायल और अमेरिका का ईरान पर हमला हुआ था तो भारत थोड़ा अलग दिख रहा था. जब उनके सर्वोच्च नेता मारे गए तो भारत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई थी. उन सब बातों को देखकर मुझे लगता है कि ईरान के राष्ट्रपति का आना और बहुत भागीदारी निभाना, इसमें हम लोगों की जो परंपरागत पोजिशन रही है. फिलिस्तीन और इजरायल को लेकर, वह लगा कि मोदी जी के 12 साल में उससे अलग हट रहे हैं. लेकिन इस सम्मेलन को हमें उसी स्टैंड पर लाया. इजरायल जो गाजा, लैबनान में कर रहा है उसकी आलोचना की गई है. यह संतोष का विषय है.”
सिर्फ चीन पर भरोसा नहीं कर सकते
सिन्हा ने कहा, “मेरा पक्का मानना है कि हम सिर्फ़ चीन पर भरोसा नहीं कर सकते. चीन ने लगातार भारत को परेशान किया है और पीठ में छुरा घोंपा है. इसलिए, बातचीत तो जारी रहनी चाहिए, लेकिन भरोसा नहीं किया जा सकता..बातचीत के बारे में, खबरों से पता चलता है कि भारत ने अपने मुद्दे ज़ोर-शोर से उठाए और चीन ने भी अपनी चिंताएं ज़ाहिर कीं. शायद बातचीत के दौरान कुछ कड़वाहट और तनाव भी रहा. कुछ लोगों का मानना है कि डिनर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की गैर-मौजूदगी द्विपक्षीय बातचीत से उनकी नाराज़गी के कारण थी. मोटे तौर पर, इस स्थिति को ऐसे देखा जा सकता है कि गिलास आधा भरा है या आधा खाली… भारत ने अपनी भूमिका बहुत सफलतापूर्वक निभाई और अध्यक्ष के तौर पर अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन किया.. हम कई विवादित मुद्दों को इस तरह से पेश करने में कामयाब रहे कि वे सभी पक्षों को स्वीकार्य हों…”
