रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है.
जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज कर दी गई थी.
अदालत ने मामले को दोबारा विचार के लिए बोर्ड के पास भेजते हुए विस्तृत और कारणों के साथ नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है.
अदालत ने कहा कि समयपूर्व रिहाई के मामले में केवल अपराध की गंभीरता को आधार बनाकर फैसला नहीं लिया जा सकता।
इस फैसले से अनिल शर्मा को समयपूर्व रिहाई की मांग पर फिर से विचार होने का रास्ता खुला है. हालांकि, हाईकोर्ट ने उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश नहीं दिया है.
कोर्ट ने कहा है कि कैदी के जेल में आचरण, उसके सुधरने की संभावना, दोबारा अपराध करने की आशंका और समाज में पुनर्वास की संभावनाओं पर भी विचार करना जरूरी है.
अनिल शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के 25 मार्च के आदेश को चुनौती दी थी. बोर्ड ने उसकी रिहाई की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि जेल में दूसरे कैदी की हत्या करने के कारण अपराध गंभीर है और रिहाई से गैंगवार होने तथा समाज में शांति भंग होने की आशंका है. बोर्ड ने न्यायिक हिरासत से पहले फरार होने का भी उल्लेख किया था.
रांची जेल में भोमा सिंह की कर दी थी हत्या
कुख्यात अपराधी रहे शर्मा रांची के लोअर बाजार थाना कांड संख्या 12/1999 में अभियुक्त हैं. उन पर बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद एक अन्य कैदी सुधीर सिंह उर्फ भोमा की हत्या करने की सजा मिली है.
मुकदमे की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने 22 मार्च 2002 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 307/34 के तहत उन्हें दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनायी थी.
बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने 29 नवंबर 2002 को अपील पर सुनवाई करते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भी 30 अप्रैल 2004 को उनकी अपील खारिज कर दी थी.
