रांचीः झारखंड में धर्मांतरित ईसाइयों को मिल रहे जाति प्रमाण पत्र के मामले में हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है.
यह याचिका प्रार्थी मेघा उरांव की ओर से दाखिल की गई है. इस याचिका में राज्य के वर्तमान राजनेताओं की जाति वैधता पर सवाल उठाते हुए शिल्पी नेहा तिर्की के जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने की मांग की गई है.
कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की मांडर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस की विधायक हैं.
‘ईसाई धर्म में नहीं होती कोई जाति’
प्रार्थी मेघा उरांव ने अपनी याचिका में संवैधानिक और धार्मिक व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए कई बिंदु का जिक्र किया है. याचिका में कहा गया है कि शिल्पी नेहा तिर्की ने नामांकन के दौरान जो शपथ पत्र दिया है, उसमें उन्होंने अपनी जाति ‘उरांव’ और धर्म ‘ईसाई’ दर्ज किया है. जबकि ईसाई धर्म में किसी भी प्रकार की जाति व्यवस्था या जाति नहीं होती है. इसके बावजूद उन्हें उरांव जाति का प्रमाण पत्र निर्गत किया गया है, जो कि न्यायसंगत नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
याचिकाकर्ता ने अपने दावों को मजबूती देने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के पूर्व के न्याय निर्णयों का सहारा लिया है. याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ‘सी सेल्वा रानी बनाम विशेष सचिव सह जिला कलेक्टर व अन्य’ के मामले में पारित आदेश का विशेष रूप से हवाला दिया गया है. इस न्याय निर्णय के आलोक में मांग की गई है कि झारखंड में जितने भी धर्म परिवर्तित ईसाई हैं, उनके अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य संबंधित जाति प्रमाण पत्रों को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए.
क्या कहते हैं मेघा उरांव
मेघा उरांव ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि उन्होंने पहले भी प्रशासनिक स्तर पर प्रयास किए थे. उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव, कार्मिक सचिव, रांची के उपायुक्त और रातू के अंचलाधिकारी (Cको लिखित आवेदन देकर शिल्पी नेहा तिर्की का जाति प्रमाण पत्र रद्द करने का आग्रह किया था. लेकिन, लंबे समय बाद भी जब प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो उन्हें मजबूरन आदिवासी और जनजातियों के हक, अधिकार तथा मूल धर्म की रक्षा के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी.
इस याचिका और मामले की जानकारी देने के लिए आयोजित प्रेस वार्ता में प्रार्थी के साथ सोमा उरांव, संदीप उरांव, विनोद कच्छप, जगन्नाथ भगत, जय मंत्री उरांव और सुशीला उरांव सहित आदिवासी समाज के कई प्रमुख लोग मुख्य रूप से उपस्थित थे.
चंपाई सोरेन याचिका के समर्थन में
इस बीच भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने इस याचिका का समर्थन कर मंत्री की जाति प्रमाण पत्र पर सवाल खड़े किए हैं.
एक्स पर उन्होंने लिखा है, झारखंड हाई कोर्ट में एक समाजसेवी ने जनहित याचिका दायर कर एक मंत्री के जाति प्रमाण पत्र पर गंभीर सवाल उठाया है. उक्त याचिका में कहा गया है कि उक्त जाति प्रमाण पत्र के एफिडेविट में धर्म के स्थान पर ईसाई लिखा गया है. जब ईसाई धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं होती, तो फिर उन्हें अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र कैसे मिला? इसी साल 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि “ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती। इसलिए अगर कोई व्यक्ति हिंदू (या सिख/बौद्ध) से ईसाई बन जाता है और सक्रिय रूप से ईसाई धर्म का पालन/ प्रचार करता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता.”
चंपाई ने आगे कहा है, “इससे पहले 27 नवम्बर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण समेत अन्य अधिकार लेने की कोशिश वास्तव में “संविधान के साथ धोखाधड़ी” है. यह भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। लेकिन फिर भी, यहां धर्मांतरित लोग आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा/ लोकसभा सीटों पर ना सिर्फ चुने जा रहे हैं, बल्कि नौकरियों में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित अधिकतर सीटों पर भी कब्जा कर रहे हैं. उन्हें कई स्कूल मुफ्त शिक्षा देते हैं, जबकि आदिवासी समाज के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ कर, काफी पीछे रह जाते हैं.”
पूर्व मुख्यमंत्री ने मंत्री के जाति प्रमाण पत्र को रद्द करने की स्पष्ट मांग की है.
