झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी सवालों के बीच रणनीतिक बिसात पर सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दूर की कौड़ी चल दी है.
पिछले चार दिनों में चुनाव को लेकर सत्तरूढ़ दलों के अंदर- बाहर और बीजेपी में जो राजनीतिक परिस्थितियां पैदा होती रहीं, उसे परखने के साथ हेमंत सोरेन ने चुनावी फिजां को न सिर्फ मोड़ा, बल्कि इसके भी संकेत दिए कि उनकी नजर कहीं दूर तक है.
झारखंड में 18 जून को राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होने हैं. एक सीट सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष दिशोम गुरुजी शिबू सोरेन के निधन से खाली हुई है. दूसरी सीट पर बीजेपी के दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा हो रहा है.
सत्तारूढ़ दलों- जेएमएम, कांग्रेस, राजद और भाकपा माले के पास 56 विधायक हैं. जेएमएम के अकेले 34 विधायक हैं. जाहित तौर पर जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत कंफर्म है.
जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस की चुनौती कायम है. भाजपा के समर्थन से उद्योगपति परमिल नथवानी उम्मीदवार हैं. उन्हें जीत के लिए और चार वोट की जरूरत है. कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं और उसे भरोसा है कि सत्तारूढ़ दलों के 12 वोट मिलेंगे, लेकिन परिमल नथवानी किसी भी दल को साधने के ‘हुनरमंद’ माने जाते हैं. एक महीने से चुनाव में उम्मीदवार खड़े करने की चुनौती पेश करने और पैंतरेबाजी दिखाती बीजेपी का आठ जून को यूटर्न लेना और नथवानी के समर्थन में जाना भी इसक एक उदाहरण है.
असम का चुनाव और अब राज्यसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दलों के बीच जैसी परिस्थितियां बनीं उसमें एक बात साफ तौर पर रेखांकित होती है कि हेमंत सोरेन कांग्रेस को साथ लेकर तो चल रहे हैं, लेकिन उसकी बहुत फिक्र भी नहीं करते. राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत कैसे तय हो, इसे भी कांग्रेस नेताओं के पाले में छोड़ा है.
बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाकर हेमंत सोरेन ने यह भी जता दिया है कि अब जेएमएम में वो जमाना नहीं रहा, जब किसी बाहर के राजनेता या उद्योग जगत के शख्सियत को राज्यसभा में भेजने का मौका दिया जाए. साथ ही ‘परिवारवाद’ की छाया को भी उन्होंने पीछे छोड़ा है.
अलबत्ता जेएमएम अब मौका पड़ने पर बीजेपी की इस बात पर घेराबंदी करेगा, हमला बोलेगा कि वह कैसे ‘बाहरी चेहरे’ को तवज्जो देती है. हालांकि, नथवानी झारखंड से पहले भी दो बार राज्यसभा के सांसद रहे हैं और सत्ता-विपक्ष दोनों खेमे में बेहतर संबंध रखते हैं.
उम्मीदवार के चयन में
झारखंड मुक्ति मोर्चा से उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर महीने भर से अटकलों का दौर, कल्पना सोरेन, अंजनी सोरेन और कई नामों के कयासों-खबरों के बीच हेमंत सोरेन ने लातेहार से पूर्व विधायक बैजनाथ राम के नाम पर मुहर लगायी, तो इसे एक चौंकाने वाला फैसला के तौर पर देखा गया.
हेमंत सोरेन ने अचानक में यह फैसला लिया हो, यह भी मुमकिन नहीं. वह पहले से माइंड मेकअप कर रखे थे. दरअसल, दूसरी बार बीजेपी को करारी शिकस्त देकर सत्ता पर काबिज हुए हेमंत सोरेन की सीधी नजर 2029 के लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव पर है.
पूर्व मंत्री बैजनाथ राम अनुसूचित वर्ग के साथ पलामू से आते हैं. 2019 में वे जेएमएम के टिकट से चुनाव जीते थे. 2024 में बीजेपी के प्रकाश राम से चुनाव हार गए थे. बैजनाथ राम को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर हेमंत सोरेन ने अनुसूचित जाति में एक संदेश देने की कोशिश की है कि वे आदिवासियों के साथ इस पिछड़े वर्ग को भी साथ लेकर चलना चाहते हैं. 2024 के चुनावों में हेमंत सोरेन ने इस वर्ग के वोट समीकरण को अपनी तरफ मोड़ा भी है. राज्यसभा चुनाव के बहाने अब राजनीतिक गलियारे में भी मायने निकाले जाने लगे हैं कि हेमंत की नजर 2029 के लोकसभा चुनाव में पलामू सीट पर भी होगी.
81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए 9 सीटें रिजर्व हैं. इनमें सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा- कांग्रेस-राजद के पास पांच और बीजेपी गठबंधन के पास चार सीटें हैं. हेमंत सोरेन को यह लगता है कि 2024 के चुनाव में चंदनकियारी और जुगसलाई में जेएमएम को मिली जीत को इससे आगे बढ़ाया जा सकता है.
राजनीतिक लिहाज से बिहार की सीमा से सटे पलामू, चतरा के इस इलाके को कभी राजद, जदयू का गढ़ के तौर पर देखा जाता था. हालांकि 2009-10 से यहां राजनीतिक समीकरण बदलने लगे. और फिर भाजपा का भी यहां झंडा लहराने लगा. और बाद में जेएमएम ने भी दखल डाला. अब उस दखल को हेमंत विस्तार देना चाहते हैं.

18 से 34 और अब नजर 41 पर
2024 के विधानसभा चुनाव में ही एनडीए को 24 सीटों पर जीत मिली, जबकि उसके वोट शेयर 38.14 प्रतिशत थे. दूसरी तरफ जेएमएम गठबंधन ने 56 सीटें जीती और वोट शेयर 44.33 प्रतिशत रहे.
2018 में हेमंत सोरेन जब चुनावी कमान संभाल कर बीजेपी से मुकाबले के लिए उतरे, तब जेएमएम में 18 विधायक थे. 2019 के चुनाव में यह संख्या 30 हुई और 2024 के चुनाव में 34 सीटों पर जीत के साथ जेएमएम सबसे बड़ा दल होकर उभऱा. दूसरी तरफ 2104 में 37 सीटों पर जीत हासिल करने वाली बीजेपी को 2019 में 24 और 2024 में 21 सीटों पर जीत मिली.
जाहिर तौर पर हेमंत बीजेपी पर चुनावी मोर्चे में भारी पड़ते दिखे. आगे इस आंकड़े को अपने दम पर 41 पहुंचाने की कोशिशों में अभी से जुटे हैं. वैसे भी आदिवासी इलाकों में हेमंत सोरेन सर्वमान्य और लोकप्रिय नेता के तौर पर उभरे हैं. जबकि 2019 में बीजेपी की हाथ से सत्ता निकलने तथा 2024 में तमाम कोशिशों में सत्ता में वापसी नहीं होने की बड़ी वजह आदिवासी इलाकों में उसकी करारी हार रही है.
विधानसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व 28 में से सिर्फ एक सीट सरायकेला बीजेपी के पास है. और लोकसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए रिजर्व सभी पांच सीटों पर बीजेपी की हार ने वैसे ही पार्टी को बड़े सेटबैक में डाला है. अर्जुन मुंडा, समीर उरांव, गीता कोड़ा, सीता सोरेन सरीखे चेहरे लोकसभा का हारे.
आदिवासी इलाकों में लोकसभा चुनाव के नतीजों के सीधा असर विधानसभा में पड़ा. कम से कम पंद्रह सीटों पर बीजेपी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा. साथ ही बीेजपी का कोई भी दांव, तिलिस्म नहीं चला.
हालिया शहरी निकायों के चुनावी नतीजे और जेएमएम की सांगठनिक गतिविधियां भी तस्दीक करती है कि हेमंत ने एक खाका खींच लिया है कि कैसे 34 से आंकड़े को 41 पर पहुंचाया जाए. नौ नगर निगमों में देवघर और गिरिडीह में जेएमएम समर्थित मेयर, डिप्टी मेयर बने हैं. जबकि शहरी निकाय चुनाव में बीजेपी की हार के साथ कमजोरियां दोनों सामने आईं. हेमंत की नजर शहरी के साथ अब सामान्य वर्ग की सीटों पर भी है. इस रणनीति पर झामुमो लगातार काम भी कर रहा है.
कांग्रेस की भी नब्ज पकड़ी
राज्यसभा चुनाव को लेकर सहयोगी कांग्रेस के साथ जेएमएम की तनातनी का जिस तरीके से पटाक्षेप हुआ, उसके पीछे भी रणनीतिक बिसात है.
राज्यसभा चुनाव को लेकर 29 मई को झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के राजू और तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी ने रांची में हेमंत सोरेन से मुलाकात कर एक सीट पर दावेदारी की थी. कांग्रेस हेमंत सोरेन के फैसले का इंतजार करती रही.
इस बीच पांच जून की रात कांग्रेस ने प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित कर दिया. जेमएम को कांग्रेस का यह फैसला चुभ गया. दोनों सीटों पर उम्मीदवार देने की बाउंड्री बांधी गई. इससे कांग्रेस के माथे पर बल पड़ गए.
छह जून को कांग्रेस के पर्यवेक्षक और रणनीतिकार के तौर पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस के नेता अजित शर्मा रांची पहुंचे. भूपेश बघेल ने शाम में हेमंत सोरेन से मुलाकात की. झामुमो और अन्य सहयोगी दलों से चुनाव में साथ चलने का आग्रह किया. सात जून की सुबह भूपेश बघेल फिर हेमंत सोरेन से मिलने पहुंचे. इसके बाद जमी बर्फ पिघलने लगी. हेमंत सोरेन के तेवर नरम पड़े. सात जून की रात हेमंत सोरेन ने अपने आवास पर सत्तारूढ़ दलों की बैठक बुलायी. झामुमो और कांग्रेस के उम्मीदवारों की जीत सुनश्चित करने का सभी विधायकों से आह्वान किया. बाकायदा बैजनाथ राम और प्रणव झा दोनों का नामांकन दाखिल कराने खुद हेमंत सोरेन भी विधानसभा पहुंचे. हेमंत ने कांग्रेस का साथ दे दिया और जीतने की रणनीति पर कांग्रेस पर छोड़ दी.
इधर झारखंड से दो बार राज्यसभा का चुनाव जीतने वाले नथवानी जीत के आंकड़े जुटाने में माहिर माने जाते हैं. छह जून की शाम में उन्होंने हेमंत सोरेन से भी मुलाकात की थी. हालांकि इस मुलाकात को चुनाव से निहायत अलग बताया था.
अब थोड़ा पीछे चलते हैं. असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हेमंत सोरेन से मुलाकात कर साथ रहन की पहल की थी, लेकिन असम में भी हेमंत सोरेन अकेले 16 सीटों पर चुनाव लड़े. भले ही असम में उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन हेमंत सोरेन ने कांग्रेस को अहसास कराया कि झारखंड में कांग्रेस सरकार में साथ है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे किसी दवाब में रहेंगे.
सोरेन ने कांग्रेस की नब्ज पकड़ ली है और वे अब इसका प्रत्यक्ष-परोक्ष लाभ अगले चुनाव तक लेंगे. एक बात और- हेमंत अपने सहयोगी दलों में जिसे तोड़ना चाहें, तोड़ सकते हैं, लेकिन इसकी मंशा कभी उन्होंने जाहिर नहीं की है.
बीजेपी के साथ क्या है
अलबत्ता कांग्रेस कई मौके पर परेशान होती दिखती है, जब सियासी हलकों में चर्चा छिड़ जाती है कि हेमंत सोरेन बीजेपी के करीब हो रहे. लेकि अब तक इसके कोई सतही आधार सामने नहीं आए हैं.
झारखंड में बीजेपी की जो हालत है उसे आलाकमान भी अच्छी तरह से समझने लगा है कि हेमंत सोरेन के सामने सभी प्रमुख नेताओं के कद छोटे पड़ गए हैं. बीजेपी आलाकमान की नजर इस पर भी है कि झामुमो, कांग्रेस को अलग कर कोई नया तानाबाना बुने. लेकिन अब तक हेमंत ने इस मामले में कोई स्पेश बीजेपी को नहीं दिया है.
बनते- बिगड़ते समीकरणों व तमाम किस्म के अटकलों के दौर में एक बात यह भी परिलक्षित होती रही है कि हेमंत भाजपा के साथ हाथ बढ़ाने के मामले में नफा-नुकसान का आंकलन भी हर मौके पर चतुराई से करते रहे हैं.
उन्हें यह भी लगता है कि कांग्रेस के साथ सरकार चलाना उनके लिए ज्यादा मुफीद है. इन सबके बीच उनकी सीधी नजर झारखंड में ‘राजनीतिक रिकॉर्ड’ बनाने की कोशिशों पर है, जिसमें वे अकेले सरकार गठन की संख्या हासिल करें.
