चेहरे पर धीर-गंभीर भाव, संभल कर बोलना, सहज, सरल होकर लोगों से मिलना, दल के शीर्ष नेता के सामने अनुशासित दिखना. यही व्यक्तित्व है सोमेश सोरेन का. जीत की खुशी में मां लड्डू खिला रही हैं और वे पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए मां के पांव छूकर आशीर्वाद लेते नजर आ रहे हैं. इन तस्वीरों से सोमेश का परिचय साफ हो जाता है. घाटशिला के विधायक चुने गए हैं. अलबत्ता इस उपचुनाव में सोमेश चंद्र सोरेन ने जीत के अंतर को लेकर अपने पिता का ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
समेश चंद्र सोरेन ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बीजेपी के बाबूलाल सोरेन को 38 524 वोटों से हराया है. सोमेश वोटों की गिनती में पहले राउंड से लगातार बढ़त बनाये हुए रहे. कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और और बाबूलाल सोरेन उनका पीछा नहीं कर सके. अंतिम राउंड में सोमेश को एक लाख 4 हजार 794 और बाबूलाल सोरेन को 66270 वोट मिले हैं. जबकि 2024 के चुनाव में बाबूलाल सोरेन को लघबग 75 हजार वोट मिले थे.
तीसरे नंबर पर झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के उम्मीदवार रामदास मुर्मू रहे हैं. 17वें राउंड में उन्हें 11,542 वोट मिले हैं. यानी 2024 के वोट से ज्यादा. झारखंड लोकतांत्रिक मोर्चा इसे अपनी जीत के तौर पर देख रहा है. दरअसल 2024 के चुनाव में रामदास मुर्मू को 8092 वोट मिले थे. तब जेएमएम और बीजेपी के इस टसल वाली लड़ाई में जेएलकेएम का इतना सा दखल भी मायने रखता है.

अब बात करते हैं कि सोमेश ने अपने पिता की रिकॉर्ड तोड़ा है. घाटशिला से तीन बार चुनाव जीते रामदास सोरेन ने 2024 के चुनाव में बीजेपी के बाबूलाल सोरेन को 23 हजार वोटों से हराया था.
ध्यान रहे कि रामदास सोरेन के निधन के बाद ही घाटशिला में उपचुनाव हुआ है और सीट एक बार फिर सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा की झोली में आ गई है. इसके साथ ही जेएमएम के पास विधायकों की संख्या पहले की तरह 34 होने जा रही है. जबकि कोल्हान की 14 सीटों में से जेएमएम गठबंधन का 11 पर कब्जा कायम है.
हेमंत-कल्पना की आंधी
अब बात करेंगे कि कैसे हेमंत सोरेन औ कल्पना सोरेन की जोड़ी की आंधी के सामने झारखंड बीजेपी एक बार फिर धाराशायी हुई है. यानी विपक्ष के द्वारा हेमंत सोरेन की सरकार की आलोचना और कामकाज को लेकर उठाये जाते रहे लगातार सवालों के बाद भी जनता के बीच हेमंत सोरेन भरोसा जीतने में कामयाब होते रहे हैं. और पार्टी की स्टार कैपेंनर कल्पना सोरेन की करिश्माई प्रचार न सिर्फ भीड़ को बांधती कनेक्ट करती है, उसे वोटों में टर्नअप भी कराने का माद्दा रखती हैं. 2024 में हुए लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव में कल्पना सोरेन अपना करिश्माई चेहरा साबित कर चुकी हैं.
दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण है कि घाटशिला उपचुनाव के नतीजे के संकेत साफ है कि आदिवासी वोट के फैक्टर को बीजेपी तोड़ नहीं सकी. यानी आदिवासी वोट टूटे नहीं. अलबत्ता सामान्य और शहरी इलाकों में भी सोमेश चंद्र सोरेन को शानदार वोट मिले है. मतलब साफ है कि अब शहरी इलाके में भी हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन की जोड़ी प्रभारी चेहरा बन रहे हैं.

हेमंत सोरेन और उनके मंत्रियों को अब मौका मिल गया है कि वे यह कह सकते हैं कि अगर जनता के बीच कामकाज को लेकर सरकार की छवि ठीक नहीं है, तो वेलोग चुनाव कैसे जीतते हैं.
इस उपचुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा को अपने आदिवासी वोट बैंक के साथ सांगठनिक मजबूती का भी फायदा मिला है. नतीजे ने यह भी साबित किया है कि हेमंत सोरेन रणनीतिक बिसार बिछाने के माहिर राजनीतिक खिलाड़ी हो गए हैं. उन्हें बखूबी पता है कि बीजेपी की कमजोर कड़ियां कहां- कहां पर है और कैसे उसे तोड़ा जा सकता है. रामदास सोरेन के निधन के बाद से ही दीपक बिरूआ, जोबा माझी, समीर मोहंती, कुणाल षाड़ंगी सरीखे नेताओं को थर्मामीटर देकर मिजाज भांपने में उन्होंने लगा दिया था.
ये नतीजे इसके भी संकेत हैं कि कोल्हान टाइगर के नाम से मशहूर चंपाई सोरेन की तमाम कोशिशें घाटशिला में सिरे नहीं चढ़ी. अपने पुत्र बाबूलाल सोरेन की जीत के लिए उन्होंने सबसे ज्यादा पसीना बहाया था. इनके अलावा जेएमएम की रणनीति और नेताओं के भारीभरकम दल के सामने बीजेपी के पांच पूर्व मुख्यमंत्री समेत लगभग 30 बड़े नेताओं की कोई तरकीब नहीं चली.
बीजेपी की सहयोगी आजसू की पैंतरेबाजी और पतलून पर जेएलकेएम की कैंची चल गई. लिहाजा सुदेश का चेहरा भी काम नहीं आया. झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा ने बीजेपी को ही नुकसान पहुंचाया है. साथ ही यह साबित किया है कि विपरीत परिस्थितियों में भी उसने लड़ने का साहस किया.
घाटशिला का उपचुनाव सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और मुख्य विपक्ष भारतीय जनता पार्टी के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बनी थी. 11 नवंबर को मतदान खत्म होने के बाद बीजेपी ने भी घाटशिला में जीत की दावेदारी भी ठोंकी थी. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने रांची में मीडिया से बातचीत में कहा था कि घाटशिला का परिणाम चौंकाने वाला और बीजेपी के पक्ष में होगा.
उधर चंपाई सोरेन, मधु कोड़ा, विद्युवतरण महतो, अन्नपूर्णा देवी, भानू प्रताप शाही, आदित्य प्रसाद साहू, अमर बाउरी, नवीन जायसवाल, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहनचरण मांझी, बंगाल बीजेपी के बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी सरीखे नेताओं का मोर्चा संभालना और प्रचार करना काम नहीं आया. बीजेपी यह उपचुनाव जीतती तो एक साथ अगली कतार के कई नेताओं को दम मिल जाता. और सत्तारूढ़ दलों को कठघरे में खड़ा करने का मौका भी. बीजेपी का इस प्रदेश में राजनीतिक भविष्य क्या होगा राम जाने…
