रांचीः परिसीमन के मुद्दे पर आदिवासी संगठनों की सक्रियता बढ़ गई है. बैठकों, मंथन और ड्राफ्ट तैयार करने का सिलसिला तेज है. आदिवासी संगठन इस बात को लेकर गोलबंदी के दायरे को बढ़ाना चाहते हैं कि परिसीमन में आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीटें किसी हाल में कम नहीं हो.
इसी सिलसिले में रविवार को प्रेस क्लब में परिसीमन का आदिवासी पर प्रभाव व संभावित समाधान को लेकर परिचर्चा आयोजित की गयी. दो अगस्त को राज्य में परिसीमन के खिलाफ आदिवासियों का महाजुटान होगा. इसमें राज्य भर से आदिवासी संगठन के कार्यकर्ता हिस्सा लेंगे.
परिचर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस नेता व पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि बिना किसी भेदभाव, बाधा या बंधन के आदिवासी एक हैं. आदिवासियों के बीच भेदभाव डालने या दीवार खड़ा करने की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी.
बंधु तिर्की ने इस परिचर्चा में कहा कि परिसीमन के खतरे की आशंका को हर हाल में टालना है. हम सभी इस मामले में गंभीर नहीं रहे तो विस्थापन, पलायन जैसी आपदाओं के बाद परिसीमन एक ऐसी विकट समस्या होगी जिसका खामियाजा संपूर्ण आदिवासी समाज को भुगतना पड़ेगा.
डॉ वासवी किड़ो ने कहा कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को किसी भी परिस्थिति में खंडित नहीं किया जा सकता है. परिसीमन में आदिवासी हितों की रक्षा हर हाल में करना होगा. अलोका कुजूर ने कहा कि आदिवासी समाज लोकतांत्रिक सुधारों का विरोध नहीं करता है, लेकिन राजनीतिक व संवैधानिक अधिकारों की कटौती स्वीकार नहीं करेगा.
बैठक में राज्यभर से 30 से अधिक संगठनों के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया. बैठक में निर्णय लिया गया कि दो अगस्त की रैली को लेकर राज्यभर में अभियान चलाया जाये. परिसीमन के दुष्प्रभाव को लेकर लोगों को अवगत कराया जाये.
बैठक में मारग्रेट मिंज, अनिल पन्ना, लक्ष्मी खलखो, सुषमा बिरली, अनिल उरांव, बरिंग हांसदा, नारायण गोप, पंचानन महतो, अगस्टीग सोरेंग, सुमति सोरेंग और प्रमिला टेटे सहित कई लोगों ने हिस्सा लिया.
