झारखंड में बड़कागांव से कांग्रेस की पूर्व विधायक और पार्टी की राष्ट्रीय सचिव अंबा प्रसाद अपने पिता, पूर्व मंत्री योगेंद्र साव को कांग्रेस से बाहर किए जाने की कार्रवाई से तल्ख हैं. उन्होंने कहा है कि आत्मसम्मान विसर्जित कर राजनीति नहीं करनी. इसके साथ ही गठबंधन की सरकार पर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं. इधर पार्टी ने अंबा की शिकायत झारखंड कांग्रेस के प्रभारी से की है.
पिछले गुरुवार को चट्टी बरियातू कोल माइंस क्षेत्र में स्थित योगेंद्र साव के मकान को बुलडोजर से जमींदोज किए जाने के बाद पूर्व मंत्री की सोशल मीडिया पर टिप्णी को लेकर प्रदेश कांग्रेस की अनुशासन समिति ने उन्हें तीन साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया है. इस कार्रवाई से साव परिवार नाराज है.
22 मार्च को योगेंद्र साव की पुत्री अंबा प्रसाद ने रांची में एक प्रेस कांफ्रेंस में इस कार्रवाई पर नाराजगी जताई थी. इसके साथ ही उन्होंने कहा, “कोयला खनन को लेकर जमीन अधिग्रहण तथा मुआवजे के सवाल और एनटीपीसी तथा पुलिस, प्रशासन के रवैये के खिलाफ पर उनका संघर्ष जारी रहेगा और यागेंद्र साव के खिलाफ कार्रवाई के विरोध में वे लोग आलाकमान तक पहुंचकर गुहार लगाएंगे.”
योगेंद्र साव के जिस घर को तोड़ा गया है, उसका विवाद पुराना रहा है और खनन क्षेत्र में विस्थापन, रैयतों को मुआवजे, जमीन अधिग्रहण, कोयले की ट्रांसपोर्टिंग को लेकर टकराव भी वर्षों पुराना.
हालांकि योगेंद्र साव, उनकी पत्नी पूर्व विधायक निर्मला देवी, बेटी अंबा प्रसाद इन बातों पर जोर देते रहे हैं कि रैयतों के हक और अधिकार की लड़ाई में उन्हें कंपनियों और पुलिस तथा प्रशासन के द्वारा परेशान किया जाता है. यह टकराव राजनीति के केंद्र में भी रहा है और बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र के वोट समीकरणों को भी प्रभावित करता है.
जाहिर तौर पर 22 मार्च को लगभग आधे घंटे के प्रेस कांफ्रेंस में अंबा ने जिन तल्खियों में अपनी बातें कहीं, वह प्रदेश कांग्रेस के साथ हेमंत सरकार को चुभ सकती हैं.
इन सबके बीच बड़कागांव और योगेंद्र साव परिवार की राजनीति को लेकर अटकलों का दौर शुरू है. अटकल यह भी कि अंबा कांग्रेस को छोड़ सकती हैं.
हालांकि तेजी से बदलती परिस्थितियों में यह भी साफ नजर आ रहा है कि योगेंद्र साव, अंबा प्रसाद के समर्थन में कांग्रेस का कोई मंत्री, विधायक या प्रदेश का प्रमुख नेता सीधे तौर पर सामने नहीं आया है. वैसे झारखंड कांग्रेस में यह रिवाज रहा है कि सत्ता में रहते नेतृत्व के किसी फैसले पर मुंह नहीं खोलना है.
अंबा प्रसाद इसे भांप रही हैं. तभी उनका बॉडी लैंग्वेज और टोन भी बदला है. वे गुस्से में हैं. 2024 में वे भले ही बड़कागांव में चुनाव हार गईं हैं, लेकिन कोई इससे इनकार नहीं कर सकता कि राजनीतिक दांव- पेंच की उन्हें बखूबी समझ है और युवाओं तथा बड़कागांव के रैयतों के बीच उनकी पकड़ रही है.
2019 में जिन परिस्थितियों में उन्होंने बड़कागांव से चुनाव जीता, उससे कांग्रेस वाकिफ है. अंबा की क्षमता देखकर ही कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया और अभी बंगाल चुनाव में भी वे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रही हैं. कांग्रेस नेतृत्व के सामने साव परिवार को लेकर एक परसेप्शन यह भी है कि योगेंद्र-अंबा कॉरपोरेट घराने के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं.

बड़कागांव और साव परिवार
2009 में योंगेद्र साव बड़कागांव से चुनाव जीते थे. वे मंत्री बने. विवादों में घिरने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद 2014 में उनकी पत्नी निर्मला देवी चुनाव जीतीं. रैयतों की लड़ाई में दोनों के खिलाफ कई केस- मुकदमे हुए. उन्हें जिला बदर होना पड़ा. राजनीतिक पटल पर मुश्किलों में पड़े योगेंद्र साव ने 2019 के चुनाव में अंबा प्रसाद को आगे किया. कांग्रेस ने टिकट दिया.
अलबत्ता राहुल गांधी भी अंबा का प्रचार करने बड़कागांव आए. चुनाव जीतने के बाद अंबा ने राजनीतिक गुर तेजी से सीखे. माना जाता है कि बड़कागांव में कांग्रेस का झंडा टिकाये रखने में साव परिवार का दमखम अहम रहा है.
लेकिन 2024 के चुनाव में अंबा हार का सामना करना पड़ा. भाजपा से साव परिवार की अदावत पुरानी रही है. हाल के दिनों में अंबा और हजारीबाग के भाजपा सांसद मनीष जायसवाल के बीच तीखी बयानबाजी सामने आई हैं. अंबा के परिवार पर कथित तौर पर कोयले, बालू के खनन, ट्रांसपोर्टिंग, ठेके-पट्टे और धन अर्जन को लेकर सवाल उठते रहे हैं. ईडी की कई दफा छापेमारी भी हो चुकी है. उनके भाई के खिलाफ ईडी ने चार्जशीट भी दाखिल किया है, जिसमें गलत तरीके से धन अर्जित करने का आरोप है.
अब इससे आगे क्या
बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कयासों का दौर शुरू है कि अंबा प्रसाद का परिवार कांग्रेस का दामन छोड़ सकता है. इसके साथ ही सवाल मौजूं है कि अगर तुरंत में योगेंद्र साव और अंबा प्रसाद ने कोई कठिन फैसला लिया, तो वे जाएंगे किस दल में.
रही बात योगेंद्र साव को पार्टी से बाहर निकलने की, तो उन्हें और अंबा दोनों को इतना अंदाजा तो है ही कि साल-दो साल अथवा तीन साल बाद चुनाव आते ही योगेंद्र साव के खिलाफ कार्रवाई खत्म हो जाएगी. झारखंड कांग्रेस में दर्जन भर ज्यादा मामले हैं कि पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जाने वाले अथवा कार्रवाई का सामना करने वाले नेताओं की वक्त पड़ते ही वापसी करा ली जाती है. योगेंद्र साव भी पार्टी के अंदर बैकफुट पर आ जाएं, इसकी भी गुंजाइश है. उन्हें लड़ना-भिड़ना आता है और समय के हिसाब से तेवर तथा बयान बदलना भी.
कड़वा सच यह भी है कि कांग्रेस में चुनावी लिहाज से कोई सीट बचाने, वोटों का समीकरण साधने अथवा कद वाले नेता को संभाले रखने के लिए पार्टी कोई स्ट्रेस लेना चाहती और न ही उसकी रणनीति में दिखती है. यहां सबकुछ नेतृत्व पर चलता है. अभी कांग्रेस के लिए झारखंड में सरकार में शामिल रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है. और इसके लिए कोई आए, कोई जाए उसे फर्क नहीं पड़ता. दूसरी तरफ- मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के एक इशारे पर कांग्रेस कोटा के मंत्री तक बदल सकते हैं, पर हेमंत इन सबमें पड़ते नहीं.
बहरहाल, बदली परिस्थितियों में एक बात साफ तौर पर रेखांकित होती है कि साव परिवार के दिल में प्रदेश कांग्रेस के रवैये को लेकर यह घर कर ही गया है कि राजनीतिक हिसाब चुकाना ही होगा. इसके लिए उन्हें समय का इंतजार हो सकता है. संकेत इसके भी हैं कि अलग-थलग पड़ने के बाद भी अंबा फिलहाल जल्दीबाजी में कोई बड़ा फैसला लेने से बचना चाहेगी.
अपनी बात नेतृत्व के सामने रखने में वे अकेलीं सक्षम हैं, पर उनका यह कहना कि घर तोड़े जाने के दौरान भारी सुरक्षा बलों की तैनाती, मां को कथित तौर पर घसीट कर थाने ले जाने और फिर एक वरिष्ठ कांग्रेसी योगेंद्र साव (पिता) पर प्रदेश नेतृत्व की कार्रवाई से चोट पहुंची है, अंदर की टीस को जाहिर करता है.
