केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि बाघ संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा करने के बारे में नहीं है, बल्कि वनों, जलक्षेत्रों और समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के बारे में भी है, जो बाघों के आवास का हिस्सा है.
बाघ संरक्षण में देश की उपलब्धियों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है.
केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि भारत ने 2022 तक वनों में बाघों की आबादी को दोगुना करने के सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रविवार को राजस्थान के अलवर में “बाघों का पुनर्वास अवसर और चुनौतियां” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया और बाघ संरक्षण और प्रोजेक्ट चीता पर तीन प्रकाशनों का विमोचन किया.
वहीं, संतुलित संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए यादव ने कहा, “हमारी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि हमारे बाघों की रक्षा हो, हमारे वन हरे-भरे और स्वस्थ रहें और स्थानीय समुदाय समृद्ध होते रहें।”
यादव ने सरिस्का बाघ पुनर्वास कार्यक्रम को वन्यजीव संरक्षण में एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह विश्व में बाघों का पहला सफल वैज्ञानिक पुनर्वास है जो उस क्षेत्र में किया गया है जहां यह प्रजाति स्थानीय रूप से विलुप्त हो गई थी.
उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम वैज्ञानिक प्रबंधन, समर्पित संरक्षण प्रयासों और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से प्रजातियों के पुनर्वास का एक सफल वैश्विक उदाहरण है.
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पन्ना और सरिस्का में बाघों का सफल पुनर्वास स्थानीय समुदायों के सहयोग और भागीदारी के कारण ही संभव हो पाया है.
इस अवसर पर यादव ने तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों- भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन पर रोड मैप, भारत में बाघों के संरक्षण और पुनर्वास पर पुस्तिका और प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक रिपोर्ट (सितंबर 2024-दिसंबर 2025) का विमोचन किया.
