तारीख दो अक्टूबर, रांची स्थित भाजपा कार्यालय में गहमागहमी के बीच गर्मजोशी से स्वागत और अभिनंदन समारोह में नये संगठन महामंत्री पवन साय अपने संबोधन में यह कहते हुए कि कार्यकर्ताओं से नारे लगवाते हैं- ‘ 2029 में हमरे जीतब’ (हम जीतेंगे).
ठीक तीन दिनों बाद तारीख पांच अक्टूबर, झारखंड के नये प्रभारी गजेंद्र पटेल का रांची दौरा और नेताओं, कार्यकर्ताओं में जोश भरने के अंदाज में संबोधन के दौरान कहते हैं, “सिर्फ कदम बढ़ाने की जरूरत है. 2029 में झारखंड फतह करने से कोई रोक नहीं सकता. जब हमने दृढ़ संकल्प के साथ पश्चिम बंगाल में जीत का झंडा गाड़ा, दिल्ली फतह किया है, तो झारखंड क्यों नहीं जीत सकते. झारखंड में तो हम पहले कई बार सरकार बना चुके हैं.”
जाहिर तौर पर पार्टी नेतृत्व ने उम्मीदों के साथ आदिवासी नेता गजेंद्र पटेल और पवन साय को झारखंड में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ झारखंड में क्रमशः प्रभारी और संगठन महामंत्री के साथ नियुक्त किया है.
इसके संकेत भी साफ हैं कि झारखंड में हाथ से सत्ता निकलने की टीस भाजपा को गहरे तक है और पार्टी की नजर आदिवासी इलाकों में खोयी जमीन वापस पाने की है. साथ ही हेमंत सोरेन से सत्ता छीनने की नये सिरे से कवायद भी. तो क्या वकई में 2029 में झारखंड में बीजेपी की सत्ता में वापसी हो सकती है?
इस सवाल के जवाब में हां अथवा ना कहना फिलहाल जल्दीबाजी होगी. अभी चुनाव में तीन साल का वक्त है और सत्ता में वापसी के लिए बीजेपी के लिए बहुत कुछ करना बाकी है. जबकि सामने में हेवी वेट और आदिवासियों के बीच सर्वमान्य नेता के तौर पर उभरे हेमंत सोरेन खड़े हैं.
तफ्सील से मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और समीकरणों पर चर्चा से पहले यह समझना मुनासिब होगा कि दो आदिवासी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ झारखंड भेजे जाने के मायने क्या हैं और उनके सामने क्या चुनौतियां हैं. झारखंड में बीजेपी किस दौर से गुजर रही है और पूर्व संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह ने संगठन को किस हाल में छोड़ा है.

संगठन में जान फूंकना सबसे बड़ी चुनौती
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले बैजनाथ मिश्रा कहते हैं, “नवनियुक्त संगठन महामंत्री पवन साय के सामने सबसे बड़ी चुनौती है संगठन को नये सिरे से चुस्त-दुरूस्त करना. पूर्व संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह के कार्यकाल ने झारखंड में पार्टी को पीछे धकेला है. आप कह सकते हैं कि कर्मवीर संगठन की जान लेकर चले गए. अगर संगठन में दम होता तो चुनावों में पार्टी की ये दुर्गति नहीं होती. पुराने नेता, कार्यकर्ता और संगठन के लिए जीने- मरने वालों से बात कर लीजिये, पार्टी किस दौर से गुजर रही है, पता चल जाएगा. भाजपा झारखंड में आदिवासी इलाकों में पहले से पस्त दिखाई पड़ रही है और अब तो शहरी इलाके में भी समीकरण बिखर रहे हैं. हालिया नगर निकाय चुनाव के नतीजे इसकी तस्दीक करते हैं.”
हालांकि दो अक्टूबर को ही महामंत्री कर्मवीर सिंह को विदाई देते हुए प्रदेश अध्यक्ष ने कहा था कि इनके मार्गदर्शन में हम सबको काम करने का मौका मिला. चार साल तक कर्मवीर सिंह ने बड़ी ही आत्मीयता के साथ एक पारिवारिक रिश्ता बनाकर हम सबों के साथ काम किया एवं संगठन को मजबूत बनाने में अहम योगदान दिया.
आदिवासी इलाके में करारी हार
2104 में 37 सीटों पर जीत हासिल करने वाली बीजेपी को 2019 में 24 सीटों पर जीत मिली थी. 2014 में ही जेवीएम से जीते छह विधायक भाजपा में चले गए थे. यानी बीजेपी के पास 43 विधायक थे.
जबकि 2014 में जेएमएम में 18 विधायक थे. 2019 में जेएमएम ने 30 सीटों पर जीत दर्ज कर कांग्रेस, राजद, भाकपा माले के साथ सत्ता पर कब्जा जमाया.
भाजपा के हाथ से सत्ता फिसलने की बड़ी वजह आदिवासी सीटों पर हार बनी. विधानसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व 28 सीटो में से 2019 के चुनाव में सिर्फ दो सीटों पर पार्टी को जीत मिली. और 2024 के चुनाव में यह संख्या एक हो गई. सरायकेला से अकेले चंपाई सोरेन जीते. यानी 27 सीटों पर जेएमएम- कांग्रेस ने जीत का झंडा गाड़ा.
अलबत्ता 2024 के चुनाव में 34 सीटों पर जीत के साथ जेएमएम सबसे बड़ा दल होकर उभऱा.
गठबंधन की बात करें तो 2024 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 24 सीटों पर जीत मिली, जबकि उसके वोट शेयर 38.14 प्रतिशत थे. दूसरी तरफ जेएमएम गठबंधन ने 56 सीटें जीती और वोट शेयर 44.33 प्रतिशत रहे.
भाजपा कई मौके पर तर्क देती रही है कि उसके वोट शेयर स्थिर हैं. दरअसल 2019 में भाजपा का वोट शेयर 33.19 था, जो 2024 में 33.23 प्रतिशत रहा.
पूछा जा सकता है कि वोट शेयर स्थिर रहने के बाद भी बीजेपी पिछड़ी कहां? दोनों चुनावों में बीजेपी का स्ट्राइक रेट बेहद निराशजनक रहा. 2024 के विधानसभा चुनाव में 68 सीटों पर लड़ी बीजेपी का स्टाइक रेट लगभग 31 प्रतिशत रहा, दूसरी तरफ 43 सीटों पर लड़े जेएमएम का लगभग 80 प्रतिशत रहा. कई आदिवासी सीटों पर जेएमएम ने 25 हजार से 42 हजार के अंतर से जीत दर्ज की.
इससे पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए रिजर्व सभी पांच सीटों पर बीजेपी की हार ने वैसे ही पार्टी को बड़े सेटबैक में डाला. अर्जुन मुंडा, समीर उरांव, गीता कोड़ा, सीता सोरेन, सुदर्शन भगत, समीर उरांव सरीखे चेहरे लोकसभा का चुनाव हार गए. 2019 में खूंटी से 14 हजार वोटों से जीते अर्जुन मुंडा डेढ़ लाख से अधिक वोटों से हारे.
झारखंड में संतालपरगना की 18 और कोल्हान की 14 सीटें सत्ता की राह तय करती है और इन इलाकों में बीजेपी की हालत चुनावी लिहाज से बेहद चिंताजनक स्थति में पहुंची है.
रिस्टोर कराने का प्रयास
नवनियुक्त संगठन महामंत्री और प्रभारी के अपने पहले संबोधन में 2029 में चुनाव जीतने के लिए नेताओं, कार्यकर्ताओं को गियरअप करने और इस भरोसे के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार तथा भाजपा को लंबे समय तक कवर करने वाले चंदन मिश्रा कहते हैं, “यह रिस्टोर (पुनर्स्थापित) करने का रणनीतिक प्रयास हो सकता है. दोनों नेता यह बताना चाहते हों कि सत्ता में वापस लौटना मुमकिन है. लेकिन जान फूंकने की शुरुआती कवायद किस हद तक सिरे चढ़ती है यह देखा जाना बाकी है. इन सबके केंद्र में एक बात अहम है कि अगर पार्टी में उत्पन्न कई ध्रुवों को पाटने में वे सफल रहे, तो परिस्थितियां बदल सकती हैं. दूसरा- यहां के नेताओं पर भी भरोसा करना होगा. उन्हें फ्री हैंड खेलने देना होगा. पुराने नेताओं, कार्यकर्ताओं को पूछा जाना, रायशुमारी करना महत्वपूर्ण हो सकता है. आदिवासी इलाकों में यह भरोसा कायम करना होगा कि बीजेपी आपके साथ है.”
नेतृत्व ने संगठन महामंत्री तथा बीजेपी प्रभारी के तौर पर दो आदिवासी चेहरे को भेजा है, इसके मायने क्या हो सकते हैं, इस पर वरिष्ठ बैजनाथ मिश्रा कहते हैं, देखिये, हमें लगता है कि नेतृत्व को झारखंड में आदिवासी चेहरे की क्षमता पर भरोसा नहीं रहा होगा. बीजेपी में आदिवासी के दो बड़े चेहरे हैं-बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा. बाबूलाल जी आदिवासी सीट से चुनाव नहीं लड़ते. एकीकृत बिहार में दो बार दुमका लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीते. इसके बाद से सामान्य सीट से ही लड़ते रहे हैं. पहले खरसावां विधानसभा सीट फिर खूंटी लोकसभा सीट से अर्जुन मुंडा की हार फिर 2024 के विधानसभा चुनाव में पोटका से उनकी पत्नी की हार बहुत कुछ बयां करती है. गजेंद्र पटेल लड़ाकू नेता हैं और पवन साय का बैकग्राउंड भी ठीक है.
नई नियुक्तियों के साथ भाजपा करे क्या, इस सवाल पर मिश्रा कहते हैं, बदली परिस्थितियों में झारखंड में बीजेपी को रघुवर दास को फ्रंट पर लाने की जरूरत है. उन्हें किसी बड़े अभियान से जोड़ा जा सकता है. वे एक मात्र चेहरा हैं, जिनके पास फॉलोइंग क्षमता है. प्रदेश में पार्टी की कार्यसंस्कृति में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है.
