खूंटीः जाने-माने आंदोलनकारी, महान शिक्षाविद एवं झारखंड की अस्मिता, संस्कृति, भाषा और अधिकारों की लड़ाई के महत्वपूर्ण वैचारिक मार्गदर्शक डॉ रामदयाल मुंडा की जयंती पर खूंटी में आदिवासियों ने उन्हें शिद्दत से याद किया.
खूंटी करम अखड़ा में श्रद्धांजिल सभा कर उनके चित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया और डॉ मुंडा के विचारो को सहेजे रखने का संकल्प लिया गया.
डॉ. रामदयाल मुंडा की जीवनी पर प्रकाश डालते हुऐ वक्ताओं ने कहा कि डॉ मुंडा का जन्म 23 अगस्त 1939 को तमाड़ प्रखंड के दिउड़ी गांव में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा खूंटी हाईस्कूल से हुई. रांची विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिकागो विश्वविद्यालय से उन्होंने डॉक्टरोरेट की उपाधि हासिल की. वे रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय ऐवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के संस्थापक होने के साथ कुलपति पद पर भी अपनी सेवा दी.
जनजातीय भाषाओ और संस्कृति के संरक्षण में उनके योगदान को महत्वपूर्ण माना जाता है. उनके प्रयासों से मुंडारी, संथाली, हो, कुडुख, नागपुरी समेत नौ जनजातीय भाषाओं को पहचान मिली. साथ ही उन्होंने आदिवासी लोक कला और संस्कृति को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई.
श्रद्धांजिल सभा में आदिवासी सरना समन्वय समति केंद्रीय सरना सिमति खूंटी, आदिवासी मुंडा यूथ एसोसिएशन, केंद्रीय युवा सरना संगम समिति सिमित खूंटी और खूंटी कलाकार समिति के सदस्य शामिल हुए.
