Ajay Sharma
खूंटीः एक सड़क की मरम्मत के इंतजार में गांवों के आदिवासी जब सिस्टम से हारे, तो प्रकृति और देवताओं की पूजा कर मरम्मत की गुहार लगायी.
राष्ट्रीय राजमार्ग-20 की सुबह साढ़े दस बजे का दृश्य किसी सामान्य आंदोलन जैसा नहीं, बल्कि आस्था, आक्रोश और प्रशासनिक विफलता का उदाहरण बन गया.
सुबह होते ही सांडीगांव की गड्ढों में तब्दील सड़क पर सैकड़ों आदिवासी ग्रामीण इकट्ठा हुए. भीड़ के केंद्र में थे पाहन बिरसिंह पाहन. पाहल के गोद में एक रंगुआ मुर्गा. भीड़ में शामिल मुखिया सुखराम सरूकद, जूरा सिंह मुंडा, चामू सिंह मानकी, बिरसिंह मानकी, नंदलाल कुमार मुंडा समेत सौ से अधिक महिला-पुरुष.
यह कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं था. यह था उस भरोसे का टूटना, जो लोग सालों से सड़क मरम्मत का इंतजार करते रहे.
“सड़क नहीं बनी, तो देवता को पुकारा”
ग्रामीणों के अनुसार सांडीगांव के पास एनएच-20 की हालत पिछले लगभग दस वर्षों से बदहाल है। जगह-जगह गहरे गड्ढे, लगातार दुर्घटनाएं के बाद भी विभागीय अनदेखी. इस दौरान आदावसियों ने कई दर्दनाक घटनाओं का भी जिक्र किया.
उन्होंने बताया कि रांची निवासी एक परिवार की गाड़ी हिरनी फॉल से लौटते वक्त इसी जर्जर सड़क पर पुलिया के नीचे गिर गई थी, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और कई लोग घायल हुए थे. वहीं, सांडीगांव चौक के पास गड्ढे में बाइक गिरने से एक आदिवासी युवती की मौत हुई. कई अन्य लोग भी इसी सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं. भीड़ में हताशा और निराशा के स्वर- बहुत हुआ, सरकार पर भरोसा खत्म हो चुका है.

लगायी सिंङबोंगा से गुहार
ग्रामीणों का कहना था कि अब वे अपने प्रकृति देवता सिंङबोंगा से ही गुहार लगा रहे हैं कि “अगर सरकार सड़क नहीं बना सकती, तो वही कोई रास्ता दिखाएं. इसी विश्वास के साथ बीच सड़क पर पूजा की गई और रंगुआ मुर्गे की बलि चढ़ाई गई.
करीब आधे घंटे तक चली इस पारंपरिक अनुष्ठान में भावनात्मक नजारा दिखा. लोग अपने-अपने तरीके से देवता से प्रार्थना करते दिखे कि यह आधा किलोमीटर का हिस्सा, जो वर्षों से जानलेवा बना हुआ है, जल्द दुरुस्त हो.
अदृश्य शक्ति के चलते
ग्रामीणों से बातचीत में यह रेखांकित होती रही कि सड़क की दुर्दशा अब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि किसी “अदृश्य शक्ति” से जुड़ी मान्यता में बदलती जा रही है, जो विकास कार्यों को रोक रही है और हादसों का कारण बन रही है.
पूजा के दौरान एनएच-20 पूरी काफी देर तक ठहर गया. कई वाहन जाम में फंसे रहे। हालांकि, कुछ यात्रियों ने भी ग्रामीणों का समर्थन किया और अपने-अपने तरीके से सुरक्षित यात्रा की प्रार्थना की.
सोशल मीडिया पर यह दृश्य तेजी से वायरल होने लगा कुछ लोग इसे व्यवस्था पर सवाल बता रहे हैं, तो कुछ इसे प्रकृति से अटूट प्रेम और भरोसा. पर सवाल एक ही है- क्या जिम्मेदार इंजीनियर, अधिकारी आदिवासियों की इस पीड़ा को दूर करेंगे.
सांडीगांव की यह घटना सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गहरा सवाल है जहां सड़कें गड्ढों में बदलती जाती हैं और लोग समाधान के लिए देवताओं की शरण में जाने को मजबूर हो जाते हैं.
