विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर अबुआ अधिकार मंच एवं मातृ शक्ति वंदन ट्रस्ट झारखंड के द्वारा रांची जिले के अनगड़ा प्रखंड स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण जोन्हा में “रन फॉर एनवायरनमेंट” (05 किमी) मैराथन दौड़ का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, जल-जंगल-जमीन के महत्व तथा युवाओं में प्रकृति के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना था.
मैराथन में 250 से अधिक युवाओं एवं दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी रही. प्रतिभागियों ने दौड़ के माध्यम से “पर्यावरण बचाओ, भविष्य बचाओ” का संदेश दिया. विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने आदिवासी समाज के प्रकृति-आधारित जीवन-दर्शन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उसकी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया.

पर्यावरण संरक्षण के संदेश को आगे बढ़ाना
अबुआ अधिकार मंच एवं मातृ शक्ति वंदन ट्रस्ट, झारखंड ने संयुक्त रूप से विगत वर्षों से पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, जल स्रोतों के संरक्षण, जन-जागरूकता अभियान तथा पर्यावरणीय विषयों पर संवाद कार्यक्रमों का आयोजन करता रहा है. “रन फॉर एनवायरनमेंट” इसी सतत अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका उद्देश्य युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करना और समाज में सकारात्मक संदेश पहुंचाना है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि झारखंड के पूर्व एपीसीसीएफ वाई के दास उपस्थित रहे. वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच के संस्थापक वेदांत कौस्तव एवं अध्यक्ष गौतम सिंह शामिल हुए. कार्यक्रम में कृष्णा मुंडा, एतवा बेदिया एवं सीताराम पातर भी अतिथि के रूप में उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन समाजसेवी जयराम महली ने किया.

पर्यावरण संरक्षण मानव अस्तित्व से जुड़ा विषय हैः वाई के दास
मुख्य अतिथि वाई के दास ने युवा धावकों को संदेश देते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व से जुड़ा विषय बन चुका है.
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के दौर में युवाओं को पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है.
उन्होंने “रन फॉर एनवायरनमेंट” जैसे अबुआ अधिकार मंच एवं मातृ शक्ति वंदन ट्रस्ट, झारखंड के द्वारा आयोजित जन-जागरूकता कार्यक्रमों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
प्रकृति ही आदिवासी समाज का जीवन दर्शनः वेदांत
अबुआ अधिकार मंच के संस्थापक एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वेदांत कौस्तव ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति और जीवन-दर्शन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित है. विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर जोन्हा जैसे प्राकृतिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल पर इस मैराथन का आयोजन करना प्रतीकात्मक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है. समाज और युवाओं की सक्रिय भागीदारी से ही पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन का स्वरूप दिया जा सकता है.

पर्यावरण संरक्षण के संकल्पों को साकार करने का समयः गौतम सिंह
अबुआ अधिकार मंच के अध्यक्ष गौतम सिंह ने कहा कि “रन फॉर एनवायरनमेंट” का उद्देश्य केवल एक दौड़ का आयोजन नहीं, बल्कि युवाओं तक यह संदेश पहुंचाना है कि स्वस्थ शरीर, स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित भविष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आना होगा.
उन्होंने सभी प्रतिभागियों से अपने जीवन में पर्यावरण संरक्षण को व्यवहार का हिस्सा बनाने, अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने तथा जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए संकल्पित होने का आह्वान किया.
5 किमी की मैराथन दौड़ में दीपक रहे प्रथम
मैराथन दौड़ में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को सम्मानित करते हुए कैश अवार्ड प्रदान किया गया. प्रतियोगिता में दीपक महतो ने प्रथम स्थान, पवन सिंह ने द्वितीय स्थान, विनोद करमाली ने तृतीय स्थान, संजय महतो ने चतुर्थ स्थान तथा पारसनाथ महतो ने पंचम स्थान प्राप्त किया. अतिथियों द्वारा सभी विजेता धावकों को सम्मानित कर उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दी.
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी प्रतिभागियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अतिथियों के बीच पौधों का वितरण करते हुए पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया गया.
कार्यक्रम के सफल आयोजन में जयराम महली, नीरज वर्मा, कृष्णा सिंह, नीतीश सिंह, अमित कुमार, अभिषेक शुक्ला, विशाल यादव, विक्की यादव, किसलय, उत्तम पाल, रंजीत, इंद्रो, बबलू, बुधराम, अरुण, कृष्णा, सीताराम पातर, उमेश महतो, ललकू, सरफराज, मनोज मुंडा, धरमा रजवार, बहादुर लोहरा सहित अबुआ अधिकार मंच के पदाधिकारियों, स्वयंसेवकों एवं स्थानीय ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही.
