उलिहातू से लौटकर अजय शर्मा
उलगुलान के महानायक बिरसा मुंडा के गांव उलिहातू के लोग भी जब पानी के लिए तरसें, धरती आबा के वशंजों को पानी खरीदना पड़े तो हालात और तमाम सरकारी आदेश, निर्देश के सच का अंदाजा लगाया जा सकता है. वैसे ये तस्वीर उलिहातू की हैं, लेकिन जनजातीय बहुल खूंटी के बड़े इलाके भीषण गर्मी में पानी के लिए जद्दोजहद कर रहे.
सरकारी योजनाएं बेपानी हैं और डाड़ी, चुआं बड़ी आबादी का सहारा है. तपती रेत पर और झुलसते जंगल- पहाड़ में महिलाएं- बच्चियां माथे पर पानी की डेकची लिए पसीने से नहायी नजर आती हैं. जलजीवन मिशन की योजनाएं गांव के गांव में दम तोड़ती नजर आती हैं.
भगवान बिरसा मुंडा के गांव में पानी संकट का आलम यह है कि उनके वंशजों को भी ‘दिरी-चापी संस्कार’ के दौरान दौ टैंकर पानी चार हजार रुपए में खरीदना पड़ा. बिरसा के वंशज ने कहा कि पानी के लिए उपायुक्त को आवेदन दिया गया था, इसके बावजूद पानी नहीं मिलने पर उन्हें पानी खरीदना पड़ा. वक्त पर पानी का इंतजाम करना जरूरी थी.
बिरसा के वंशज सुखराम मुंडा कहते हैं, “पूरा गांव पानी की संकट से गुजर रहा है. गर्मी के मौसम में भी दो दिन पर एक दिन नहाते हैँ. नहाने के लिए पानी उनकी बहू गांव के एक खेत में बने कुंए से डेकची में भरकर माथे पर ढ़ोकर लातीं हैं. गांव में पानी की जल्द व्यवस्था होनी चाहिए.”

तीन मई के बाद से ठप है जलापूर्ति
पूर्व ग्राम पंचायत सदस्य सामुएल पुर्ती बताते हैँ कि तीन मई को तेज आंधी के कारण किताहातू पंप हाउस के सामने लगे ट्रांसफारमर पर एक पेड़ गिर गया था. जिसके बाद से जलापूर्ति पूरी तरह ठप है. पूर्व में पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के द्वारा लगायी सोलर टंकी कई सालों से खराब पड़ी है. एक-दो चापानल हैं, जिससे इतना गंदा पानी निकलता है कि उसे पीना या कपड़ा धोना संभव नहीं है.
डाड़ी में बस इतना पानी
बिरसा ओड़ा के पीछे खेत में एक डाडी है. इसका नाम है मधुकम डाड़ी. यहां लगभग दस फीट की गहराई में चट्टान है, जिसमें रात भर खेतों से रिसकर पानी जमा होता है. भोर होते ही यहां महिलाओं की भीड़ लग जाती है और घंटे भर में पानी घट जाता है, लेकिन लगभग छह इंच पानी हमेशा रहता है, जिसमें बाल्टी डूबो कर हर बार आधा बाल्टी पानी महिलाएं निकालतीं हैं. यह पानी उनके जीने का सहारा बन गया है.
गोलगा के कुंए में है चार फीट पानी
उलिहातू में खेतों में बने गोलगा मुंडा के सिंचाई कूप में लगभग तीन फीट पानी बचा है. यह कुंआ गांव की आबादी वाले क्षेत्र से आधा किमी दूर है. महिलाएं इस कुंए से पीने का पानी डेकची व बाल्टी में भरकर ले जातीं हैं.
कुंए में पानी भर रही सुमित्रा कुमारी बताती हैं, “इस कुंए का पानी भी तेजी से सूख रहा है. हमारी चिंता भी गहरी हो रही है. अगर जल्द प्रयाप्त बारिश नहीं हुई, तो यह कुंआ भी सूख जाएगा.’’
माथे पर पानी लेकर जा रही बच्ची मगदली के चेहरे से पसीने टपक रहे थे. वह पानी नी ले जाते हुए थक चुकी थी. वह कहती है, ‘’इस गांव में एक पोटो डाड़ी है, जिसका जलस्तर भी तेजी से नीचे जा रहा है”
ग्रामप्रधान की पीड़ा
ग्रामप्रधान निर्मल मुंडा बताते हैं कि उलिहातू में 133 परिवार निवास करते हैं. और तीन कुंआ-डाड़ी इन सभी परिवार के लिए पानी का सहारा है. पानी की कमी के कारण वे स्वंय गर्मी के इस मौसम में भी दो-तीन दिनों में एक दिन नहाते हैँ. जिस कुंए में नहाने जाते हैँ, वह गांव से लगभग एक किमी दूर है और पानी 20 फीट गहराई में है. उम्र अधिक हो जाने के कारण कुंए तक जाने और पानी भरने में उन्हें परेशानी होती है.
ग्राम प्रधान बताते हैं कि कपड़ा धोने और मवेशियों को पानी पिलाने के लिए गांव के लोग डेढ़ किमी दूर बउला मुंडा के तालाब में जाते हैँ, जिसका पानी इन दिनों काफी गंदा हो गया है, लेकिन मजबूरी यह है कि इस पानी के सिवा कोई दूसरा विकल्प उनके पास नहीं है.
उलिहातू में पानी की इस बेबस कहानी और समस्या पर सफाई देते हुए पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के कार्यपालक अभियंता ने बताया कि आंधी-पानी के बाद ट्रांसफार्मर बदला गया था, जो लीक करने लगा था, जिसके बाद दोबारा ट्रांसफॉर्मर लगा दिया गया है, जिसे चार्ज होने में 24 घंटे लगते हैँ. संभावना है कि मंगलवार से जलापूर्ति शुरू हो जाएगी.
