रांचीः रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को परसीमन और एमएमडीआर के सवाल पर आदिवासी महाजुटान में बड़ी भीड़ जुटी. इस महाजुटान में नेताओं ने हुंकार भरी कि अगर परिसीमन में आदिवासियों की सीटें घटी, तो किसी कीमत पर स्वीकार नहीं होगा.
पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बंधु तिर्की की अगुवाई में आयोजित इस महाजुटान में झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के राजू, प्रदेश अध्यक्ष केवश महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव सरकार में मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय समेत कई विधायक अगली कतार में दिखे.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस महाजुटान में शामिल नहीं हुए, पर उनके कई कटआउट मैदान में लगे दिखे.
तमाड़ से झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक विकास कुमार मुंडा का इस महाजुटान में शामिल होने के भी मायने निकाले जा रहे हैं.
महाजुटान में सबसे ज्यादा जोर परिसीमन के मुद्दे पर रहा. आदिवासी नेताओं ने आशंका जताई कि आने वाले समय में जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने पर झारखंड में आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है.
पूर्व विधायक बंधु तिर्की और झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधते हुए आदिवासी समाज से एकजुट होकर अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने का आह्वान किया.
बंधु तिर्की ने कहा कि यह लड़ाई केवल लोकसभा और विधानसभा सीटों को बचाने की नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के संवैधानिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है.
उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड की पहचान और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.
मंत्री शिल्पी नेहा ने क्या कहा
महाजुटान को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा, “दिल्ली वालों देख लो, आदिवासी समाज अपने अधिकार के लिए तैयार है.”
उन्होंने कहा कि आदिवासियों का प्रतिनिधित्व समाज स्वयं तय करेगा, दिल्ली सरकार नहीं। परिसीमन के बाद आदिवासी सीटों की संख्या कम होना स्वीकार नहीं होगा. अधिसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समाज का आरक्षण और प्रतिनिधित्व बरकरार रहना चाहिए.
क्या है झारखंड में समीकरण
गौरतलब है कि 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व सीटों की संख्या 28 और प्रदेश में लोकसभा की 14 सीटों में से पांच आदिवासियों के लिए रिजर्व हैं. राजनीतिक लिहाज से आदिवासी सीटों पर सत्तारूढ़ झामुमो- कांग्रेस का दबदबा है. विधानसभा की 27 सीटें झामुमो-कांग्रेस के पास है. और लोकसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व सभी पांच सीटों पर इन्हीं दो सत्तारूढ़ दलों का कब्जा है.
सिर्फ जनसंख्या नहीं बने परिसीमन का आधार
बंधु तिर्की समेत अन्य नेताओं ने कहा कि परिसीमन के दौरान सिर्फ जनसंख्या को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों की परिस्थितियों, ऐतिहासिक विस्थापन और संविधान के तहत मिले विशेष संरक्षणों को भी ध्यान में रखना चाहिए.

केंद्र सरकार पर निशाना
महाजुटान के मंच से केंद्र सरकार पर आदिवासी हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया. नेताओं ने कहा कि आदिवासी समाज के अधिकारों और राजनीतिक हिस्सेदारी की रक्षा के लिए एकजुट होना जरूरी है.
परिसीमन के अलावा सीएनटी-एसपीटी एक्ट, एमएमडीआर संशोधन बिल, पांचवीं अनुसूची, जल-जंगल-जमीन और आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर नेताओं ने अपनी बात रखी. साथ ही केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए गए. वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए संघर्ष जारी रहेगा.
राहुल गांधी का संदेश
झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने अपने संबोधन में कहा कि भाजपा आदिवासियों को “वनवासी” कहती है, जबकि राहुल गांधी हमेशा उन्हें मूलवासी और आदिवासी मानते हुए जल, जंगल और जमीन पर उनका अधिकार स्वीकार करते रहे हैं.
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में लगातार साथ रहे हैं और ओडिशा में आदिवासियों के धार्मिक स्थल की रक्षा के आंदोलन में भी शामिल हुए थे.
के. राजू ने बताया कि रैली से पहले उनकी राहुल गांधी से बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की चिंता का संदेश भेजा.
पांच प्रस्ताव पारित
1.परिसीमन में एसटी आरक्षित सीटें बढ़ाने की मांग
परिसीमन के दौरान आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी स्वीकार नहीं होगा. लोकसभा और विधानसभा की सीटें बढ़ती हैं तो एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाए. पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र, ऐतिहासिक पुनर्स्थापन और विशेष प्रावधानों को भी परिसीमन का आधार बनाने की मांग की गई.
2. MMDR संशोधन कानून का विरोध
सभा ने खान एवं खनिज विकास और विनियमन संशोधन कानून का विरोध. प्रस्ताव में कहा गया कि यह कानून राज्यों की राजकोषीय स्वतंत्रता, विधायी अधिकार और सहकारी संघवाद को प्रभावित करता है।
3. आदिवासी जमीन के अवैध हस्तांतरण पर रोक
सीएनटी और एसपीटी कानूनों का उल्लंघन कर आदिवासी जमीन के अवैध हस्तांतरण, कब्जे और बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की गई. अवैध रूप से हस्तांतरित जमीन को मूल रैयतों को वापस दिलाने की मांग भी उठी.
4. ग्रामसभा की अनुमति के बिना खनन- अधिग्रहण पर रोक
पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में ग्रामसभा की सहमति के बिना खनन, जमीन अधिग्रहण और विस्थापन पर रोक लगाने की मांग की गई. पेसा कानून 1996 और वन अधिकार कानून 2006 को झारखंड में प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर.
5. अलग सरना धर्म कोड की मांग
आदिवासी धार्मिक पहचान और अस्मिता के लिए जनगणना फॉर्म में सरना धर्म कोड का अलग कॉलम देने की वर्षों पुरानी मांग को महाजुटान में फिर दोहराया गया.
