मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर विपक्षी सांसदों का प्रदर्शन तीसरे दिन 8 अक्तूबर को भी जारी है. गुरुवार को अलग-अलग राज्यों में भी विरोध प्रदर्शन देखे गए.
इस बीच 42 पूर्व जजों ने खुला पत्र लिखकर ‘चुनाव आयोग को कमज़ोर करने की कोशिशों’ के ख़िलाफ़ चेतावनी दी है.
इस पत्र में पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कथित तौर पर कमज़ोर करने की कोशिशों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है.
खबरों के मुताबिक पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले पूर्व जजों ने ‘बिना किसी ठोस सबूत के लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर सवाल उठाया है.
उन्होंने चेतावनी दी है कि संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार ”चोर” और ”मिलीभगत” बताने से लोकतंत्र में जनता का विश्वास कमज़ोर होने का ख़तरा है.
पत्र में कहा गया है, “संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन उन्हें बदनाम करना नहीं.”
संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश
‘भारत के नाम खुला पत्र’ के नाम जारी इस पत्र में रिटायर्ड जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के लिए चल रहे अभियान पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने बिना किसी सबूत के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर सवाल उठाए हैं साथ ही संवैधानिक अधिकारियों को बार-बार ‘चोर’ और ‘मिलीभगत वाला’ बताने के खिलाफ चेतावनी दी है.
पत्र में लिखा है, ‘हम यह इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि ऐसे समय में चुप रहना कोई न्यूट्रल विकल्प नहीं है. हमारी चिंता गंभीर है. भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं.’
कठपुतली और समझौता जैसे शब्दों पर आपत्ति
पत्र में विशेष रूप से जिक्र किया गया है कि सार्वजनिक मंचों से ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोप तो उछाले जाते हैं लेकिन जब निर्वाचन आयोग की तरफ से हलफनामा देकर इन्हें साबित करने को कहा जाता है, तो कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं रखा जाता.
पूर्व जजों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जतायी है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को चोर, कठपुतली और समझौता कर चुके जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जा रहा है. और चुनाव अधिकारियों के नाम सार्वजनिक कर सत्ता बदलने पर कार्रवाई की चेतावनी देने जैसी प्रवृतियां बेहद खतरनाक है.
