झारखंड में निकाय चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस तथा मुख्य विपक्ष भारतीय जनता पार्टी के बीच टसल तीखा होता जा रहा है. कई जगहों पर अपने दम पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार समीकरणों के लिहाज से बड़े दलों को परेशान करते दिख रहे हैं. चुनाव भले ही गैर दलीय कराए जा रहे हैं, पर मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक दलों के अध्यक्ष राजनीतिक बिसात बिछाने में जुटे हैं. दरअसल, ये राजनीतिक टसल अगले लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मद्देनजर शहरों में पैठ बढ़ाने और बचाने के लिए हो रहा है.
इन सबके बीच आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो का एक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि आजसू पार्टी राजनीतिक नैतिकता का पालन करते हुए किसी भी प्रत्याशी का समर्थन नहीं कर रही. जिला कमेटी अपने स्तर पर निर्णय लेगी. इसके साथ ही सुदेश इन बातों पर जोर देते रहे हैं कि अगर सत्तारूढ़ दलों को चुनाव में जोर आजमाना ही था, तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दलीय आधार पर चुनाव करवा लेते.
सुदेश महतो का यह बयान 11 फरवरी को सामने आया है. पार्टी कार्यालय में एक मिलन समारोह था. मीडिया से बातचीत मे निकाय चुनाव को लेकर आजसू प्रमुख ने यह भी कहा कि वे स्पष्ट राजनीति करते हैं.
निकाय चुनाव को लेकर जिस तरह की तस्वीरें उभर रही हैं उसमें बेशक दलीय आधार पर चुनाव कराना चाहिए था, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि नैतिकता की दुहाई और दलीय चुनाव पर जोर देकर आजसू प्रमुख खुद का फेस सेव करने की कोशिशों और चालांकियों में जुटे हैं.
फिलहाल सुदेश पार्टी में मिलन समरोह की पॉलिटिक्स पर केंद्रित हैं. वैसे यह मिलन समारोह पांच साल तक चलता रहता है, लेकिन चुनावों में इसके आउटपुट उन्हें उम्मीदों के अनुरूप नहीं मिलते.
दमदार कैंडीडेट नहीं मिले क्या
सुदेश महतो को बखूबी पता है कि निकाय चुनाव में एक- दो शहरों को छोड़कर अधिकतर जगहों पर आजसू में सन्नाटा है. बीजेपी- कांग्रेस- जीएमएम के टसल में पार्टी को मेयर, अध्यक्ष पद के लिए कद वाले खोजे उम्मीदवार नहीं मिले. मिलते भी कैसे. दरअसल अब तक शहरी इलाके में आजसू ने झंडे- बैनर तो बहुत लहराये हैं, इवेंट बहुत किए हैं पर संगठन में धार नहीं चढ़ा पाये. और न ही 25 सालों में शहरों में ढंग का वैचारिक नेता पैदा कर सके.
विधानसभा चुनाव के नतीजे का तकाजा आजसू प्रमुख के सामने हैं, जिसमें उन्हें यह समझना होगा कि समारोह में, बैठकों में, जुलूस में आपका भाषण जोशीला हो सकता है, जिंदाबाद- जिंदाबाद, जय सुदेश खुशहाल प्रदेश के नारे गूंज सकते हैं. लेकिन वास्तविकता में वह समीकरण बदलने के निष्कर्ष की तरफ नहीं जाता. हां, इससे आपके कुछ कार्यकर्ता, IT सेल से लेकर टीवी मीडिया अच्छी रील्स काट सकता है, अख़बार अच्छी हेडिंग बना सकते हैं लेकिन इससे दल में दम नहीं भरता.
लिहाजा उन्हें अपनी राजनीतिक ट्रैक में बदलाव लाने होंगे. उन्हें पीछे पलटकर देखना होगा कि झारखंड की राजनीति की धुरी रहने वाला चेहरा सत्ता के संघर्ष में कैसे हाशिये पर जा रहा है.
गैर दलीय आधार पर निकाय चुनाव हो रहे हैं. लेकिन सत्तारूढ़ और मुख्य विपक्ष बीजेपी चुनाव में जोर-आजमाइश इसलिए ही कर रही है कि जनाधार को बचाया- बढ़ाया जा सके. संगठन को बांधे रखा जा सके.
जाहिर तौर पर आजसू के लिए भी संगठन में मोरल बूस्टअप करने का प्लेटफॉर्म होता. जिन शहरों में भी पहचान और प्रभाव था, वहां सुदेश को लड़ना-भिड़ना था. इससे कार्यकर्ताओं को चुनावी गुर सीखने के मौके मिलते और दूसरे दलों को चुनौती भी मिलती.

शहरों में जनाधार का सवाल
जब शहरों में आजसू की पैठ की बात छिड़ी है, तो सिर्फ दो उदाहरण की चर्चा कर लेते हैं. 2014 में रांची लोकसभा का चुनाव लड़कर जमानत गंवाये सुदेश महतो को रांची विधानसभा सीट से लगभग साढ़े छह हजार वोट मिले थे. जबकि पिछले नगर निगम के चुनाव में रांची के मेयर पद के लिए जेएमएम की उम्मीदवार रहीं बरसा गाड़ी एक लाख दस हजार वोट लाकर दूसरे नंबर पर रहीं. और वही बरसा गाड़ी ने 2019 में आजसू के टिकट से रांची विधानसभा का चुनाव लड़ीं, तो वे ढाई हजार वोटों में सिमट गईं. यही फर्क है दल का. संगठन का. प्रभाव का.
बरसा गाड़ी अभी आजसू की केंद्रीय सचिव हैं. रांची में वार्ड नंबर एक से चुनाव लड़ रही हैं. लेकिन बिल्कुल अपने दम पर. अपनी साख पर.
सुदेश महतो और उनके निकट रहने वाले केंद्रीय नेताओं ने निकाय चुनाव से किनारा इसलिए भी लिया हो कि 2024 के विधानसभा चुनाव में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के मजबूत उभार और झारखंड मुक्ति मोर्चा की आंधी में खेत हुए नेताओं को नतीजे आने के बाद यह कहने का स्पेस मिल जाएगा कि दलीय आधार पर चुनाव नहीं था और चुनाव में आजसू ने केंद्रीय स्तर पर खम ठोंका भी नहीं था.
यह दीगर बात कि गिने- चुने विधानसभा क्षेत्रों की राजनीति करने वाले सुदेश कुमार महतो प्रदेश में झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस की कतार में खड़े होने से खुद को कभी कमतर नहीं आंकते.
चार फरवरी को सुदेश महतो दिल्ली में थे. वहां उन्होंने जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव से मुलाकात कर कुछ अहम मांग की ओर ध्यान दिलाया था. अपने फेसबुक पेज पर उन्होंने इस मुलाकात की तस्वीरें साझा की थी.
पार्टी कार्यकर्ता की प्रतिक्रिया
आजसू प्रमुख के इसी पोस्ट में सुमित कुमार पासवान नामक एक युवा कार्यकर्ता ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है,
“ माननीय सुदेश महतो जी, मुझे ये सोच कर और कहते हुए बहुत दुख हो रहा है कि हमारी पार्टी ने अब तक निकाय चुनाव को लेकर कोई भी निर्णय नहीं लिया है. जबकि बीजेपी, जेएमएम , कांग्रेस, जेएलकेएम ने भी अपने उमीदवार मेयर और वार्ड पार्षद में दिया है. लेकिन हमारी पार्टी, जहां तक हमें मालूम है, निकाय चुनावों को लेकर कुछ नहीं कहा है. क्या आजसू पार्टी सिर्फ लोक सभा या विधानसभा मै ही सक्रिय राजनीति करती है. या फिर सोशल मीडिया वाली राजनीति करती है. इस तरह की निष्क्रियता ने ही पार्टी एक विधायक पर आ टिकी है. मननीय मै एक युवा हूं. हो सकता है कि मैं भोलेपन मै अगर कुछ गलत कहा दूं तो हमें माफ कीजियेगा.”
मुमकिन है सुदेश कुमार महतो ने आजसू कार्यकर्ता सुनील पासवान की यह प्रतिक्रिया देखी-पढ़ी नहीं होगी और नजर पड़ी भी हो शायद इसे एक अच्छा उदाहरण नहीं समझा हो.
जबकि राजनीतिक ढलान के जिस मोड़ से आजसू प्रमुख गुजर रहे हैं उसमें यह प्रतिक्रिया उनके लिए नजीर हो सकती है. कार्यकर्ताओं का मन पढ़ना ही होगा, बजाय इसके कि सिर्फ आदेश थोपे जाएं.
राज्य के कुल 48 निकायों में 9 नगर निगम, 20 नगर परिषद तथा 19 नगर पंचायतों के लिए चुनाव होंगे. इन निकायों के लिए 1087 वार्डों में वार्ड पार्षदों के अलावा महापौर/अध्यक्ष का प्रत्यक्ष निर्वाचन होना है. इनमें रांची, धनबाद, मानगो, मेदिननीगर, चास नगर निगम चुनाव पर पूरे राज्य की निगाहें टिकी है.
12 फरवरी को सुदेश महतो धनबाद गए थे. मिलन समारोह था. वहां जिला कमेटी मेयर पद के लिए शांतनु चंद्रा का समर्थन कर रही है. शांतनु चंद्रा ने उस दिन सुदेश महतो के साथ मंच भी साझा किया. सुदेश महतो ने कहा है कि अब धनबाद की राजनीति को पार्टी केंद्र में रखेगी. मतलब धनबाद में आजसू राजनीतिक दावेदारी बढ़ायेगी.
क्या यह सच नहीं है कि धनबाद की राजनीति में आजसू प्रमुख तांक-झांक इसलिए बढ़ा रहे हैं कि वहां झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा उभार लेने लगा है. अलबत्ता मेयर पद पर जेएलकेएम ने अपना उम्मीदवार भी खड़ा किया है.
धनबाद की राजनीति में भाजपा और झामुमो गठबंधन का दबदबा में स्पेस निकालना फिलहाल उनके लिए आसान भी नहीं होगा. कार्यकर्ता सिर्फ सांगठनिक मजबूती और विस्तार के लिए नहीं होते. चुनाव लड़ने की भी उनकी महत्वाकांक्षा होती है.

जहां वजन तौला जाएगा
अब बात उन निगम, नगर परिषद की, जहां आजसू का वजन तौला जाना है. रांची नगर निगम में सुरेंद्र लिंडा के समर्थन में आजसू छात्र संघ के प्रदेश अध्यक्ष ओम वर्मा समेत कई कार्यकर्ता फीलिंडग कर रहे हैं. पर कार्यकर्ता खुलकर सोशल मीडिया या किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर यह प्रचार नहीं कह पा रहा कि सुरेंद्र लिंडा आजसू समर्थित उम्मीदवार हैं.
उधर लोहरदगा में आंदोलनकारी राजेंद्र लोहरा अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे हैं. गिरिडीह जिला अध्यक्ष और सांसद प्रतिनिधि गुड्डू यादव वार्ड का चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी नजर डिप्टी मेयर पद पर है. रामगढ़ नगर परिषद का चुनाव आजसू के लिए प्रतिष्ठा से जुड़ा है.
मांडू के विधायक और पार्टी महासचिव तिवारी महतो अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहीं रेणु मुंडा के लिए मोर्चा संभाले हैं. मनोज महतो वार्ड का चुनाव लड़ रहे.
रामगढ़ में अध्यक्ष पद के लिए आजसू समर्थित उम्मीदवार को झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा, भाजपा और कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार से टकराना है.
उधर रेणु मुंडा को समर्थन दिये जाने से रामगढ़ में विरोध अलग ही फूट पड़ा है. पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष योगेश बेदिया ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. योगेश के बाद भी इस्तीफा जारी है.
बहरहाल नतीजे आने के बाद 48 निकायों में मेयर, डिप्टी मेयर अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और 1087 वार्डों में किस दल का दबदबा होता है और आजसू प्रमुख की प्रतिक्रिया में ट्विस्ट कैसा होता है यह भी देखा जाना बाकी है.
