रांची: गुजरात में चुनाव आयोग से पंजीकृत, लेकिन बगैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को कथित तौर पर मिल रहे करोड़ों रुपये के चंदे को लेकर झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद पांडेय ने गंभीर सवाल उठाए हैं.
बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि जिन पार्टियों की न तो स्पष्ट राजनीतिक गतिविधियां दिखाई देती हैं, न वे नियमित रूप से चुनाव लड़ती हैं और न ही उनके कार्यालयों की सक्रियता नजर आती हैं, तब उनके खातों में सैकड़ों करोड़ रुपये कैसे पहुंच रहे हैं, इसकी जांच होनी चाहिए.
विनोद पांडेय ने कहा कि यह मामला केवल गुजरात तक सीमित नहीं है. यदि किसी राजनीतिक दल के नाम पर भारी रकम का लेनदेन हो रहा है, तो उसके स्रोत, दानदाताओं और धन के इस्तेमाल की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए. उन्होंने कागजों पर चल रहे ऐसी राजनीतिक पार्टियों की तुलना शेल कंपनियों से करते हुए कहा कि हैरत की बात यह है कि यह बेहद गंभीर मामला है, लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इतने गंभीर मुद्दे पर चुनाव आयोग, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय जैसी संस्थाएं मौन क्यों हैं.
उन्होंने कहा कि देश में बड़ी संख्या में राजनीतिक दल चुनाव आयोग के पास पंजीकृत हैं. इनमें कुछ को राष्ट्रीय और कुछ को राज्यस्तरीय पार्टी की मान्यता प्राप्त है, जबकि बड़ी संख्या में दल Registered Unrecognised Political Parties के रूप में दर्ज हैं. चुनाव आयोग के 2024 Atlas के अनुसार देश में 2670 RUPPs दर्ज थी. RUPP होना अपने आप में किसी पार्टी को फर्जी या अवैध नहीं बनाती. यह केवल चुनाव आयोग की मान्यता की एक अलग श्रेणी है. किसी दल की वित्तीय या राजनीतिक गतिविधियों पर सवाल होने की स्थिति में उसके रिकॉर्ड की अलग से जांच जरूरी होती है.
करोड़ों का चंदा कैसे?
झामुमो के केंद्रीय महासचिव ने कहा कि गुजरात में सामने आए कुछ मामलों में कथित तौर पर ऐसी पार्टियों का जिक्र है जिनके अध्यक्ष, ट्रेजरर और कार्यालय की वास्तविक सक्रियता तक स्पष्ट नहीं है. उन्होंने सवाल उठाया कि “चंदा कौन दे रहा है, क्यों दे रहा है और उस पैसे का इस्तेमाल कहां और कैसे हो रहा है?”
मनी लॉन्ड्रिंग का मामला तो नहीं?
झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद पांडेय ने सवाल उठाया कि कहीं इन राजनीतिक दलों के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग तो नहीं हो रही है? उन्होंने कहा कि यदि ऐसा कोई संदेह है तो जांच एजेंसियों को इसकी तह तक जाना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि इन पार्टियों को चंदा देने वाले लोग या संस्थाएं कौन हैं.
चुनाव आयोग और जांच एजेंसियां
झामुमो नेता ने केंद्रीय जांच एजेंसियों और आयकर विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि राजनीतिक मामलों में अक्सर सीबीआई और ईडी की जांच की मांग की जाती है, लेकिन यदि किसी राजनीतिक दल के खातों में इतनी बड़ी रकम होने की जानकारी सामने आ रही है तो संबंधित एजेंसियां इसकी पड़ताल क्यों नहीं करतीं?
उन्होंने कहा कि गुजरात की कथित ‘शेल पार्टियों’ को लेकर उठे सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गए हैं. मामला केवल किसी पार्टी के पंजीकरण का नहीं, बल्कि चंदे की पारदर्शिता, दानदाताओं की पहचान, प्राप्त धन के इस्तेमाल और राजनीतिक गतिविधियों के बीच संभावित संबंध का है.
