झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर हुए चुनाव के नतीजे आने के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस और राजद के बीच तकरार बढ़ी है. आंकड़े रहने के बाद भी कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा क्रॉस वोटिंग की वजह से हार गए. इस हार ने कांग्रेस को परेशान किया है. दरअसल, प्रणव झा कांग्रेस नेतृत्व की पसंद के उम्मीदवार थे और झारखंड से एक सीट निकालने के लिए पार्टी ने हर संभव रणनीतिक कोशिशें की थीं.
उधर मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने से पार्टी वैसे ही परेशान रही. यह मामला राजनीतिक सुर्खियों में रहा और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. इसके बाद झारखंड में भी सरकार की सहयोगी कांग्रेस को आंकड़े रहने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा. यानी, राज्यसभा में कांग्रेस कम से कम अपनी दी सीटें बढ़ाने की आस खो बैठी.
झारखंड में एक सीट पर सरकार की अगुवाई कर रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैजनाथ राम की जीत हुई. यह जीत पहले से कंफर्म थी. इसलिए कि 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में जेएमएम के पास 34 विधायक हैं. प्रथम वरीयता में जीत के लिए 28 वोट की जरूरत होती है. इस चुनाव में तीन वोट इनवैलिड हुए. जबकि बैजनाथ राम को 30 वोट मिले.
कांग्रेस के 16 विधायक हैं. और सरकार में शामिल सभी दलों के विधायकों की संख्या 56 है. नतीजे आने के बाद कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के राजू ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा, “जेएमएम के शेष चार वोट प्रणव झा को मिले, लेकिन राजद और भाकपा माले ने धोखा दिया.”
आरोप है कि राजद के चारों और माले को दोनों विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की. अब कांग्रेस के इसी आरोप पर सत्तारूढ़ दलों में जुबानी जंग छिड़ी है. राजद और माले इन आरोपों का खंडन कर रहे. ऊंची आवाज में.
कांग्रेस के प्रभारी के राजू पार्टी उम्मीदवार के खुद पोलिंग एजेंट थे. इसलिए वोट में कांग्रेस के किसी विधाययक ने बांये-दायें किया हो, इसकी गुंजाइश नहीं दिखती. इससे पहले कांग्रेस और गठबंधन के सभी बड़े नेता 56 के आंकड़े पर ही नतीजे से पहले तक दंभ भर रहे थे कि उनके विधायक इंटैक्ट हैं और दोनों सीटों पर जीत होगी. विधायकों को इंटैक्ट रखने के लिए हेमंत सोरेन की अगुवाई में संयुक्त बैठकें होती रहीं. डिनर पॉलिटिक्स हुई. मॉक पोल के रिहर्सल किए गए, लेकिन नथवाणी की रणनीति में कांग्रेस की उम्मीदें धरी रह गईं.

एक के बाद एक ट्विस्ट
राज्यसभा चुनाव को लेकर चार जून को कांग्रेस द्वारा उम्मीदवार के तौर पर प्रणव झा के नाम की घोषणा के बाद जेएमएम की तनातनी से कांग्रेस के माथे पर बल पड गए थे. लेकिन तनातनी का तेजी से पटाक्षेप भी हुआ. इसके बाद मुलाकात, बैठक का सिलसिला तेज हुआ. हेमंत सोरेन आगे आए और मोर्चा संभाला. बाकायदा बैजनाथ राम और प्रणव झा दोनों का नामांकन दाखिल कराने खुद सोरेन सहयोगी विधायकों के लेकर विधानसभा पहुंचे. चुनाव के दौरान एक वक्त लगा कि गठबंधन के 56 विधायक इंटैक्ट होने लगे हैं. इससे नथवाणी की राह कठिन हो सकती है.
चुनाव के दौरान राज्यसभा चुनाव को लेकर झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के राजू और तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्ठी, कांग्रेस के पर्यवेक्षक और रणनीतिकार, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के अलावा अजित शर्मा, सांसद सांसद डॉ सैयद नसीर हुसैन, झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव सरीखे नेताओं ने अलग-अलग समय में हेमंत सोरेन के आवास पर जाकर मुलाकात की. झामुमो और अन्य सहयोगी दलों से चुनाव में साथ चलने और चुनावी रणनीति का नेतृत्व का आग्रह किया.
चुनाव से ठीक 15-16 घंटे पहले होटल रेडिसन ब्लू से एनडीए के 24 विधायकों की एक तस्वीर सामने आई. जवाब में हेमंत सोरेन की एक भी तस्वीर सामने आई, जिसमें वे कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा और जेएमएम के उम्मीदवार बैजनाथ राम का हाथ थामे दिख रहे हैं. इस तस्वीर ने राजनीतिक गलियारे के साथ मीडिया का ध्यान खींचा और इसके मायने निकाले जाने लगे. लेकिन नतीजे बताते हैं कि सहयोगी दलों ने कांग्रेस का साथ भी दिया और दोनों सीटें जीतने की रणनीति भी पिट गई, जिससे गठबंधन की छवि, दावे और एका पर सवाल उठने लगे हैं.
इधर बीजेपी की बांछे इस बात पर खिली है कि कांग्रेस की हार हुई. जाहिर तौर पर बीजेपी नेताओं को कांग्रेस के खिलाफ टीका-टिप्पणी का स्पेस भी मिल गया. सच यह भी है कि सत्तारूढ़ दलों में किनके वोट फिसले, कैसे फिसले, सभी बड़े रणनीतिकारों को अंदाजा लग चुका है.
तब पूछा जा सकता है कि कांग्रेस को जो जख्म मिले हैं, क्या उससे सरकार की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला है और क्या गठबंधन में इससे दूरियां बढ़ सकती है. क्या कांग्रेस नेतृत्व कोई सख्त रुख अख्तियार करेगा या चुप्पी साध लेगा?
इसकी चर्चा आगे चलकर तफ्सील से करते हैं.
उससे पहले बात नथवाणी की
दूसरी सीट पर एनडीए के समर्थन से जीते निर्दलीय उम्मीदवार परिमलन नथनाणी 28 वोट लाकर जीते हैं. एनडीए में बीजेपी के 21, आजसू, जदयू और लोजपा (आर) के एक-एक वोट हैं. एक वोट झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के जयराम कुमार महतो का है.
नथवाणी पहले भी झारखंड से दो बार राज्यसभा के सांसद रहे हैं. उन्हें सत्ता-विपक्ष दोनों खेमे के समीकरणों को साधने का ‘हुनरमंद’ माना जाता है. राज्यसभा चुनाव लड़ने के लिए आखिरी वक्त तक उम्मीदवार देने की पैंतरेबाजी करती झारखंड बीजेपी ने आठ जून को यू टर्न लेते हुए जब परिमल नथवाणी को समर्थन देने की बात कही, तब ही इसके संकेत मिल गए थे कि इस चुनाव में दांव पहले से ही ऊंचे थे.
नामांकन दाखिल करने से ठीक पहले रांची आए नथवाणी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से भी मुलाकात की थी. हालांकि, इस मुलाकात को उन्होंने चुनाव से अलग बताया था.
सत्तारूढ़ दलों के अपने स्वार्थ अपने तीर
थोड़ा पीछे चलते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस और राजद के सामने चुनाव लड़ने की दावेदारी के साथ सीटें देने की पहल की थी. कांग्रेस ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. चुनाव लड़ने के लिए राजद से अधिक सीटें लेने के लिए वह खुद जूझ रही थी. जेएमएम के लिए सीट छोड़ने का फैसला लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को लेना था. लेकिन तेजस्वी ने जेएमएम के लिए सीट नहीं छोड़ी.
कांग्रेस, राजद का यह रवैया झारखंड मुक्ति मोर्चा को चुभ गया. जेएमएम के कई प्रमुख नेताओं ने बयानों में तल्खियां जाहिर की. कयासों का दौर शुरू हुआ कि झारखंड में मंत्रिमंडल से राजद को बाहर किया जा सकता है. लेकिन बात आई-गई होकर रह गई.
2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड में राजद को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी, लेकिन हेमंत सोरेन की सरकार में पूरे पांच साल राजद विधायक सत्यानंद भोक्ता मंत्री रहे. 2024 में राजद के 4 विधायक जीते हैं. और गठबंधन के दम पर ही. वर्ना, राजद का खूंटा झारखंड में 2014 में ही उखड़ गया था. सरकार में राजद कोटा से एक संजय यादव मंत्री भी हैं.
दो बार बीजेपी को शिकस्त देने वाले सोरन झारखंड की सियासत में दूर की कौड़ी चलते रहे हैं. उन्हें पता है कि कांग्रेस ने अगर टन-मन किया, जिसकी गुंजाइश कम है तब भी राजद के ये 4 और माले के 2 विधायक बड़े काम के साबित होंगे. और कांग्रेस साथ चलती रही, तो बीजेपी की टेंशन कायम रहेगी. दूसरी तरफ कांंग्रेस को यह लगता है कि उसके भी 16 विधायक हैं और प्री-पोल एलायंस में शामिल रही है इसलिए वह सरकार में बनी रहे. दूसरा- नेतृत्व के सामने मुश्किलें और बेबसी यह भी है कि हिंदीपट्टी राज्यों से वह सत्ता से लगभग उखड़ चुकी है. तब झारखंड में सरकार में टिके रहना राजनीतिक मजबूरियां भी है.
अब हेमंत सोरेन कांग्रेस की इस हार को कैसे लेते हैं यह देखा जाना बाकी है. लेकिन असम का चुनाव और अब राज्यसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दलों के बीच जैसी परिस्थितियां बनीं उसमें एक बात साफ तौर पर रेखांकित होती है कि हेमंत सोरेन कांग्रेस को साथ लेकर तो चल रहे हैं, लेकिन उसकी बहुत फिक्र भी नहीं करते.
बिहार असम, बंगाल की बात
हालिया बिहार में हुए राज्यसभा चुनाव में विपक्ष की ओर से राजद ने 5वीं सीट के लिए एक प्रत्याशी दिया. विपक्षी विधायकों की संख्या 41 बनती थी, जो जीत के लिए पर्याप्त थी. लेकिन कांग्रेस के तीन विधायकों की वोट से अनुपस्थित रहने की वजह से राजद उम्मीदवार हार गए. और राजद कोटे की रिक्त सीट भाजपा की झोली में चली गई.
अब इस परिणाम को बिहार से भी जोड़ कर देखा जा रहा है कि वहां मिले जख्म का बदला राजद ने झारखंड में कांग्रेस से चुकाया हो. हालांकि राजद के विधायक इन बातों पर जोर दे रहे हैं कि धोखा देना पार्टी ( राजद) की फितरत नहीं रही है. वेलोग लालू के सच्चे सिपाही हैं और न झुकते हैं और न ही टूटते हैं. उन्होंने अपने वोट पार्टी के महासचिव भोला यादव, जो आधिकारिक तौर पर इलेक्शन एजेंट थे उन्हें दिखाकर दिए हैं. हालांकि, इसके बीसियों उदाहरण हैं कि राजद के कई प्रमुख नेता समय के साथ बीजेपी में जा चुके हैं.
अब थोड़ा पीछे चलते हैं. असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेताओं ने हेमंत सोरेन से मुलाकात कर साथ रहने की पहल की थी, लेकिन सोरेन कांग्रेस की परवाह किए बिना असम के आदिवासी इलाकों में चुनावी चौसर बिछाने लगे. वहां हेमंत सोरेन अकेले 16 सीटों पर चुनाव लड़े. भले ही असम में उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन सोरेन ने कांग्रेस को अहसास कराया कि झारखंड में कांग्रेस सरकार में साथ है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे किसी दवाब में रहेंगे. या दूसरे राज्यों में भी साथ चलेंगे.
हेमंत की सीधी नजर
पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने कांग्रेस की बजाय तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में खुलकर प्रचार किया. दरअसल, सोरेन ने झारखंड को लेकर कांग्रेस की कमजोर नस पकड़ ली है. दूसरा- हेमंत को बखूबी पता है कि परिस्थितियां जो भी रहे, सत्ता की स्टीयरिंग उनके हाथों में ही रहेगी. पिछले कुछ महीनों की राजनीति के संकेत यह भी हैं कि हेमंत सोरेन की सीधी नजर अगले चुनाव में अपने दम पर 41 का आंकड़ा हासिल करने पर है.
अलबत्ता कांग्रेस कई मौके पर परेशान होती दिखती है, जब सियासी हलकों में चर्चा छिड़ जाती है कि हेमंत सोरेन बीजेपी के करीब हो रहे. लेकिन अब तक इसके कोई ठोस सतही आधार सामने नहीं आए हैं.
दूसरी तरफ झारखंड में बीजेपी की जो हालत है उसे आलाकमान भी अच्छी तरह से समझने लगा है कि हेमंत सोरेन के सामने सभी प्रमुख नेताओं के कद छोटे पड़ गए हैं. बीजेपी की पर्दे के पीछे चाहत रही है कि जेएमएम कांग्रेस से किनारा करे, लेकिन सोरेन भाजपा के साथ हाथ बढ़ाने के मामले में नफा-नुकसान का आंकलन भी हर मौके पर चतुराई से करते रहे हैं. उन्हें यह भी लगता है कि कांग्रेस के साथ सरकार चलाना उनके लिए ज्यादा मुफीद है इसलिए वे बीजेपी को कोई स्पेस देना नहीं चाहते.
मुमकिन है कि राज्यसभा चुनाव में मिले जख्म को कांग्रेस नेतृत्व भूल जाए या वक्त पर छोड़ दे. कोई कठिन फैसला लेने से झारखंड मेंं भी बिखराव, बगावत का खतरा हो सकता है. बयानबाजी के बीच प्रदेश में कांग्रेस के नेता भी यू टर्न लेते या बैकफुट पर आते दिखाई पड़ेंगे. सवाल सत्ता में बने रहने का है. कहने को यह होगा कि नेतृत्व इस मामले को देख रहा है.
