रांचीः झारखंड में प्रस्तावित लोकसभा एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के संभावित प्रभावों, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों तथा राज्यहित से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-मंथन तेज हुआ है.
इसी सिलसिले में रविवार को राँची प्रेस क्लब, करमटोली में कांग्रेस नेता, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की की अगुवाई में एक सर्वदलीय बैठक की गई. इसमें राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के अलावा शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर व्यापक विचार-विमर्श किया.
बंधु तिर्की ने कहा कि यदि परिसीमन के कारण अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित विधानसभा एवं लोकसभा सीटों में किसी भी प्रकार की कटौती की जाती है तो आदिवासी समाज इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आदिवासी समाज अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक जनआंदोलन करेगा.
उन्होंने आगामी 2 अगस्त 2026 को राँची में आयोजित होने वाली “आदिवासी एकता महाजुटान रैली” में राज्यभर के लोगों से बड़ी संख्या में शामिल होने का आह्वान किया।
भाकपा माले के शुभेंदु सेन, भारतीय आदिवासी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रेमशाही मुंडा, आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक एवं सामाजिक कार्यकर्ता शशि पन्ना आम आदमी पार्टी के झारखंड प्रभारी राजेश लिंडा के अलावा देवकी नंदन बेदिया एवं आर.डी. मांझी, आदिवासी संघर्ष मोर्चा के जगरनाथ उरांव, सुषमा बिरूली, गोविंद टोप्पो, अनिल उरांव, रजनी मुर्मू सहित विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों एवं जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे तथा परिसीमन के मुद्दे पर व्यापक एकजुटता पर जोर दिया.
वक्ताओं ने कहा कि झारखंड एक अनुसूचित क्षेत्र एवं आदिवासी बहुल राज्य है, जहाँ संविधान की पाँचवीं अनुसूची, पेसा कानून तथा आदिवासी समाज के ऐतिहासिक एवं संवैधानिक अधिकारों का विशेष महत्व है. ऐसे में प्रस्तावित परिसीमन के दौरान अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में किसी भी प्रकार की कमी संविधान की मूल भावना, सामाजिक न्याय तथा झारखंड राज्य के गठन के उद्देश्य के प्रतिकूल होगी.
