झारखंड की सियासत में इन दिनों चर्च- मिशनरी बनाम आरएसएस-नागपुर के नाम पर सियासत गरमाई हुई है. भाजपा और कांग्रेस आमने- सामने हैं. आरोप- प्रत्यारोप की झड़ी लगी है. कई सामाजिक, धार्मिक संगठनों की भी प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं.
30 अगस्त को रांची में आयोजित प्रस्तावित परिसीमन के सवाल पर आदिवासी महाजुटान से ठीक पहले कथित तौर पर रांची कैथोलिक आर्चडायसिस की ओर से जारी एक पत्र ने राजनीतिक हलके के साथ सामाजिक, धार्मिक संगठनों में भी प्रतिक्रियाओं की गूंज सुनाई पड़ने लगी, जिसमें परिसीमन के विरोध में इस रैली में आदिवासी समाज के लोगों से बड़ी संख्या में इसमें शामिल होने की अपील की गई है.
पत्र के मुताबिक कहा गया कि उस रविवार (30 अगस्त) को हर पल्ली में केवल सुबह की मिस्सा रखी जाएगी और मिस्सा के बाद अन्य कार्यक्रम नहीं रखने को कहा गया, ताकि लोग जुलूस में हिस्सा ले सकें.
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव समेत कई नेताओं ने इस कथित पत्र को सोशल मीडिया पर जारी करते हुए तल्ख टिप्पणियां कीं.
कांग्रेस नेता बंधु तिर्की के नेतृत्व में हुए इस आदिवासी महाजुटान में बड़ी भीड़ जुटी. इसकी संख्या लाख से अधिक आंकी गई. रैली में मंच पर अगली कतार में झारखंड कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता, कई विधायक, सांसद, मंत्री भी मौजूद रहे. जाहिर तौर पर कांग्रेस और बंधु तिर्की दोनों को इस रैली के जरिए राजनीतिक पैमाने पर उभार मिला.
रैली में बड़ी भीड़ जुटने के बाद राजनीतिक बहस और बयानबाजी इस बात पर होने लगी कि आदिवासी महाजुटान को मिशनरियों का साथ मिला. रैली को चर्च के द्वारा कथित तौर पर फंडिग के भी आरोप चस्पां किए जाते रहे.
कई सरना आदिवासी संगठनों ने खुलकर आरोप लगाए कि आदिवासी महाजुटान मिशनिरियों के द्वारा आहूत है और इसमें भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर बुलाया जा रहा है.
आदिवासी महाजुटान के ठीक बाद
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने उसी दिन एक प्रेस कांफ्रेस में आदिवासियों के हक-अधिकार को छीनने, राज्य की लगातार बदलती डेमोग्राफी को लेकर कांग्रेस, मिशनरी और राज्य सरकार पर जमकर निशाना साधा.
बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने हमेशा आदिवासियों के साथ धोखा और छल करने का काम किया है. मिशनरियों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि आदिवासियों को रैली में शामिल होने के लिए आर्च डायसिस की ओर से पत्र जारी किया जाता है. मिशनरियों ने भी आदिवासियों को सदैव भ्रमित किया है. कांग्रेस ने यहां के लोगों की भावनाओं की कभी कद्र नहीं की. और इसका साथ मिशनरियों ने बखूबी दिया है.
उधर चंपाई सोरेन ने एक्स पर अलग ही आदिवासी महाजुटान पर सवाल खड़े करते हुए मिशनिरियों पर निशाना साधा. साथ ही कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया.
सौरेन ने एक्स पर कहा, “जिस कांग्रेस ने 1967 में बाबा कार्तिक उरांव जी के द्वारा लाए गए डीलिस्टिंग बिल को ठंडे बस्ते में डाल कर आदिवासी समाज का अस्तित्व ही संकट में डाल दिया, जिन्होंने 1961 में आदिवासी धर्म कोड हटाया, जिन्होंने दर्जनों बार आदिवासियों पर गोलियाँ चलवाई, वे किस मुँह से स्वयं को आदिवासियों के हितैषी बताते हैं? आप वास्तव में उन ईसाइयों के हितैषी हैं, जो आदिवासी समाज को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों में अतिक्रमण करते जा रहे हैं। आदिवासियों के लिए आरक्षित 90% से ज्यादा सरकारी नौकरियों पर इन्हीं का कब्जा है। सिमडेगा, पाकुड़ एवं साहेबगंज समेत कई जिलों में हमारे जाहेरस्थान तथा सरना स्थलों पर अगर ताला लग गया है, तो उसके जिम्मेदार भी यही लोग हैं.”

बंधु तिर्की ने आरएसएस पर साधा निशाना
उधर आदिवासी महाजुटान में जुटी बड़ी भीड़ से उत्साहित झारखंड के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की समेत कई कांग्रेस के नेताओं ने आदिवासी सवालों पर बीजेपी, आरएसएस पर निशाना साधा. बंधु तिर्की ने आरोप लगाया कि झारखंड को नागपुर बनाने का प्रयास चल रहा है.
उन्होंने कहा”आज हमें प्रस्तावित परिसीमन का विरोध करने का संकल्प लेना होगा. यह राज्य आदिवासियों के लिए बनाया गया था, और हम आदिवासी अधिकारों को छीनने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेंगे,”
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा और आरएसएस आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम करना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, “अगर वे 2007-08 की रिपोर्ट के आधार पर अथवा जनसंख्या के आधार पर परसीमन प्रक्रिया को अंजाम देते हैं, तो हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे. आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने को तैयार हैं.”
महाजुटान में अन्य कई आदिवासी नेताओं ने भी भाजपा और एसएसएस पर तीखे हमले किए. लब्बोलुआब यह कि प्रस्तावित परिसीमन के मुद्दे पर आयोजित आदिवासी महाजुटान में बीजेपी और आरएसएस के साथ केंद्र की सरकार निशाने पर रही.

रघुवर ने किया पलटवार
आदिवासी महाजुटान में बीजेपी और आरएसएस पर हमले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास भी पलटवार करने से नहीं चूके.
उन्होंने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी में कहा, “आदिवासी महाजुटान रैली के आयोजकों द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर झारखंड को नागपुर बनाने की कोशिश करने का आरोप लगानेवालों को यह समझना चाहिए कि झारखंड के एक हिस्से को छोटानागपुर भी कहा जाता है. मिशनरियों का षडयंत्र है कि झारखंड को ईसाइयत प्रदेश बनाया जाए. लेकिन झारखंड की जनता अपने राज्य को इटली वालला ईसाइयत प्रदेश कभी बनने नहीं देगी. जहां तक आरएसएस की बात है, इस संगठन की पहचान राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रवाद के प्रति निष्ठा, अनुशासन और निस्वार्थ समाजसेवा से है. आयोजकों को यह भी समझना चाहिए कि स्वयं ईसाई समुदाय के एक वरिष्ठ धर्मगुरु द्वारा पूर्व में आरएसएस को राजनीतिक अथवा धार्मिक संगठन न मानते हुए राष्ट्र और मानव कल्याण के लिए कार्य करने वाला संगठन बताया गया था.”
उन्होंने आगे कहा, “कांग्रेस ने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया. जिस कांग्रेस के हाथ देश के विभाजन के खून से सने हो, उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन पर टिप्पणी करने से पहले अपने इतिहास पर विचार करना चाहिए.”
फ्रंट की आपत्ति, धर्म की कसौटी पर नहीं तौलें
रघुवर दास के सोशल मीडिया के इस बयान पर ऑल इंडिया क्रिश्चियन माइनॉरिटी फ्रंट ने आपत्ति जतायी है. फ्रंट के महासचिव प्रवीण कच्छप ने कहा है कि आदिवासी एकता महाजुटान को लेकर पूर्व सीएम का बयान पूर्वाग्रह को दर्शाता है. झारखंडी पहचान, अस्तितत्व और एकजुटा को धर्म की कसौटी पर तौलना भी ठीक नहीं. राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है , लेकिन पूरे ईसाई समुदाय को मिशनरी षड़यंत्र से जोड़ना तथ्यसम्मत नहीं है. ईसाई आदिवासी समाज भी इसी झारखंड का अभिन्न हिस्सा हैं.
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