रांचीः पर्युषण महापर्व के अष्टम एवं अंतिम दिवस को क्षमा दिवस के रूप में श्रद्धा और आत्मचिंतन के साथ मनाया गया. श्री साधुमार्गी जैन संघ, रांची द्वारा आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में स्वाध्यायी श्रीमती पुष्पा जी ओसवाल ने क्षमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान महावीर ने कहा है कि “क्षमा वीरस्य भूषणम् अर्थात् क्षमा वीरों का आभूषण है,” केवल वही व्यक्ति सच्चे अर्थों में क्षमा कर सकता है, जिसमें अपने क्रोध, अहंकार और प्रतिशोध की भावना पर विजय पाने का साहस हो.
क्षमा दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मबल और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है. इस अवसर पर अंतकृद्दशांग सूत्र के वाचन का समापन हुआ.
स्वाध्यायी श्रीमती पुष्पा जी ओसवाल ने चंदनबाला के जीवन का प्रेरणादायक प्रसंग सुनाया. उन्होंने बताया कि चंदनबाला भगवान महावीर की परम श्रद्धालु शिष्या थीं. अनेक कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने धैर्य, संयम और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा.
चंदनबाला के प्रसंग को बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने लंबे समय तक कठोर तप करने के बाद विशेष अभिग्रह लिया था कि वे एक विशिष्ट परिस्थिति में रहने वाली कन्या के हाथों से ही आहार ग्रहण करेंगे! चंदनबाला ने पूर्ण श्रद्धा और निर्मल भाव से उन्हें उड़द के बचे हुए दाने अर्पित किए. भगवान महावीर ने उनका आहार स्वीकार किया और उनका तप पूर्ण हुआ.
यह आत्मशुद्धि का अवसर
स्वाध्यायी जी ने कहा कि पर्युषण केवल आठ दिनों का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का अवसर है. व्यक्ति को अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ को पहचानकर उनसे मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए.
क्षमा दिवस पर मन, वचन और कर्म से हुई भूलों के लिए क्षमा मांगना तथा दूसरों को हृदय से क्षमा करना ही पर्व की वास्तविक सार्थकता है. संध्याकाल मे सामूहिक सांवत्सरिक प्रतिक्रमण का आयोजन किया गया, जिसमे काफ़ी संख्या मे लोगों ने भाग लिया.
16 सितंबर को जैन भवन मे सुबह 10 बजे से स्वाध्यायी जी का विदाई समारोह एवं क्षमावाणी कार्यक्रम आयोजित होगा.
