रांचीः झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सोमवार, 28 सितंबर को पार्टी के कार्यकर्ता राज्य के सभी जिला मुख्यालयों में प्रदर्शन करेंगे. रांची में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (सीईओ) के कार्यालय का घेराव किया जायेगा.
केशव महतो कमलेश ने रविवार को रांची स्थित पार्टी ऑफिस में एक प्रेस कांफ्रेंस में चुनाव आयोग पर बीजेपी के कथित एजेंट के तौर पर काम करने और बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने के लिए उसे “अनुचित” लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया.
कमलेश ने कहा, “कांग्रेस कार्यकर्ता लोकतंत्र और नागरिकों के वोटिंग अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य के सभी ज़िला मुख्यालयों में प्रदर्शन करेंगे और रांची में सीईओ के ऑफ़िस का घेराव करेंगे. पार्टी कार्यकर्ता सीईसी के इस्तीफ़े की भी मांग करेंगे.”
उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार सबूतों के साथ “वोट चोरी” का मुद्दा उठाते रहे हैं, जो अब सबके सामने आ गया है. इसके साथ ही झारखंड कांग्रेस प्रमुख ने आरोप लगाया कि दलितों और अल्पसंख्यकों समेत पार्टी के पारंपरिक वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है.
कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने आरोप लगाया कि सीईसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया और वोटर लिस्ट से वोटरों के नाम हटाने के लिए नए तरीके अपनाए.
यादव ने आरोप लगाया, “नए वोटरों के लिए ‘फॉर्म-6’ की प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल बना दिया गया है ताकि वे रजिस्टर न कर सकें। वोटर लिस्ट से 13 करोड़ वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे देशभर में आक्रोश फैल गया है.”
उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी-विरोधी वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की हर संभव कोशिशें की जा रही हैं.
झारखंड कांग्रेस ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के काम के तौर तरीके जगजहिर हो गया है. मौजूदा हालात में पार्टी ने देश भर में विरोध विरोध प्रदर्शन करने का फ़ैसला किया.
गौरतलब है कि अखबार की इस रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फ़ैसलों और आदेशों पर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी, जो उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए थे, जबकि एसआईआर का राष्ट्रीय स्तर पर रोलआउट पूरे आयोग की देखरेख में हो रहा था.
रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी आपत्तियां इस बात पर थीं कि कानूनी वोटर रजिस्ट्रेशन फ़ॉर्म 6 में कैसे बदलाव किए गए, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने का काम कैसे हुआ, और इलेक्टोरल रोल डेटाबेस पर सेंट्रलाइज़्ड कंट्रोल कैसे रखा गया.
