रांचीः विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह कुछ खास अफसरों पर मेहरबान है और कई सक्षम तथा अनुभवी अधिकारियों को साइड लाइन कर दिया गया है. इसका सीधा असर कानून व्यवस्था पर पड़ा रहा है और राज्य की जनता इसका खामियाजा भुगत रही है.
जमशेदपुर के एक मॉल में गोलीबारी की घटना को लेकर उन्होंने झारखंड की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
मरांडी ने कहा, मैंने अपने स्तर से पूरी स्थिति की जानकारी ली है. लोगों से बातचीत में जो बातें सामने आईं, वह बेहद भयावह हैं.
मरांडी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा है कि पहले जिस तरह की घटनाएं धनबाद से सुनने को मिलती थीं, आज वही दहशत राज्य के दूसरे शहरों तक फैल चुकी है. सवाल सीधा है, झारखंड में आम आदमी आखिर कहां सुरक्षित है?
पुलिस के शीर्ष पदों पर किसे तवज्जो?
उन्होंने कहा, “पुलिस के शीर्ष पद पर रिटायर्ड अधिकारियों को डीजीपी बनाने का जो हैरतअंगेज और गैर-कानूनी सिलसिला शुरू हुआ, उसने झारखंड पुलिस की निष्पक्षता, गरिमा और जवाबदेही को गंभीर चोट पहुंचाई है. नीरज सिन्हा के बाद सबसे विवादास्पद और दागदार अधिकारियों में गिने जाने वाले अनुराग गुप्ता और अब तदाशा मिश्रा जैसे रिटायर्ड अधिकारियों को डीजीपी बनाकर रखने से साफ संदेश गया है कि यहां योग्यता, ईमानदारी और अखिल भारतीय पुलिस सेवा के नियम नहीं, बल्कि सत्ता के प्रति वफादारी और कदमताल ही पदस्थापन का पैमाना है. जब पुलिस नेतृत्व का आधार मेरिट नहीं, सेटिंग बनेगा, तो सड़क पर कानून नहीं, डर का राज ही दिखाई देगा.”
अतिरिक्त प्रभार के मामले सार्वजनिक हों
मरांडी ने सवालिया लहजे में कहा, मुख्यमंत्री बताएं कि एडीजी स्तर के अधिकारी मनोज कौशिक के पास रांची जोनल आईजी का प्रभार बनाए रखने और रांची में डीआईजी का पद खाली रखने की क्या मजबूरी है. पुलिस मुख्यालय में प्रोविजन और ट्रेनिंग की जिम्मेदारियां संभालने वाले अधिकारी मयूर पटेल को दुमका आईजी का भी पद देने का प्रशासनिक औचित्य क्या है. पंकज कंबोज और नरेंद्र कुमार सिंह सहित अन्य अधिकारियों के बीच अतिरिक्त प्रभार बांटने का आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए.
तेज आदिवासी अधिकारियों की अनदेखी
वहीं उन्होंने सीआईडी में पदस्थ आदिवासी समाज से आने वाले अजय लिंडा और असीम विक्रांत मिंज जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की क्षमता का समुचित उपयोग नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि राकेश बंसल के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटने के बाद चार महीने से अधिक समय तक पदस्थापन की प्रतीक्षा में रहने की जानकारी भी गंभीर है. लंबा अनुभव रखने वाले माइकल राज जैसे अधिकारी का पुलिस, सीआईडी और एसीबी की महत्वपूर्ण जांचों में कितना उपयोग किया जा रहा है, यह भी जनता को बताया जाना चाहिए. अगर पुलिस की कुर्सियां योग्यता से नहीं, वफादारी और सेटिंग से बांटी जाएंगी, तो सड़क पर कानून नहीं, भय चलेगा.
