रांची: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर बढ़ी राजनीतिक हलचल के बीच सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अब तक पत्ते नहीं खोले हैं. जबकि सत्तारूढ़ दलों के अलावा बीजेपी की निगाहें हेमंत सोरेन की रणनीति और निर्णय पर टिकी है.
इस बीच शुक्रवार को कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के राजू और तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी विक्रमार्का ने हेमंत सोरेन से मुलाकात कर एक सीट पर दावेदारी की.
करीब डेढ़ घंटे की मुलाकात के बाद हेमंत सोरेन के आवास से बाहर निकले के राजू ने मीडिया से कहा, “हमने राज्यसभा चुनाव को लेकर बातचीत की है. दोनों सीटों पर सत्तारूढ़ दलों की जीत तय करनी है और भाजपा की हार सुनिश्चित कराना है.”
हालांकि इस बैठक में कांग्रेस ने एक सीट पर दावेदारी की है. दरअसल, सत्तारूढ़ दलों के पास 56 विधायक हैं और अगर एकजुट और रणनीतिक ढंग से वे चुनाव लड़े, तो दोनों सीटों पर उनकी जीत हो सकती है.
के राजू ने मीडिया से यह भी कहा कि मुख्यमंत्री जल्दी ही अपने निर्णयों से अवगत करायेंगे. हमने उनसे आग्रह किया है कि वे ही राज्यसभा चुनाव की रणनीतिक अगुवाई करें.
क्यों टिकी हैं निगाहें
हालांकि कांग्रेस नेताओं से मुलाकात और लंबी बात के बाद हेमंत सोरेन ने एक्स पर इस मुलाकात को बस शिष्टाचार बताया है. उन्होंने अपनी तरफ से कहीं नहीं लिखा या कहा है कि राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस के नेताओं से बातचीत हुई है. भाजपा की राज्यसभा चुनाव में जीत की कोई कोशिश नहीं सफल होने वाली.
वैसे भी राज्यसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा से कौन उम्मीदवार होगा, इस पर भी हेमंत सोरेन ने फैसला सार्वजनिक नहीं किया है. जाहिर तौर पर झामुमो की नजर भी हेमंत सोरेन पर लगी है. इस बीच ओडिशा से झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ता शुक्रवार को रांची पहुंचे . उन्होंने हेमंत सोरेन की बहन अंजनी सोरेन को राज्यसभा भेजने की मांग रखी. साथ ही अंजनी सोरेन के समर्थन में नारे भी लगाए.
झारखंड मुक्ति मोर्चा से उम्मीदवार कौन होगा, यह फैसला भी हेमंत सोरेन को लेना है. इस फैसले से कोई विधायक, नेता बाहर जाएं इसकी गुंजाइश नहीं है. इसलिए कि हेमंत सोरेन अब पार्टी के सबसे बड़े दारोमदार होने के साथ कमांड रखने में भी माहिर माने जाते हैं.
18 जून, 2 सीटें और अंकगणित
18 जून को झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होने हैं. एक सीट झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष शिबू सोरेन के निधन से खाली हुई है. दूसरी सीट पर भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त होने वाला है.
81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए 28 विधायकों के वोट की जरूरत होगी.
सत्ताधारी दलों में झामुमो के पास 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और भाकपा माले के 2 विधायक (कुल 56) हैं. अंकगणित के लिहाज से दोनों सीट सत्तारूढ़ दल जीत सकते हैं.
राजद के वोटों का फैसला तेजस्वी यादव लेंगे और भाकपा माले के दो वोटों को लेकर पार्टी महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य का निर्णय अहम होगा.
वैसे एक सीट पर झामुमो की जीत कंफर्म है. झामुमो के पास पर्याप्त संख्याबल है. कांग्रेस को यह लगता है कि सत्ता में सहयोगी दलों के समर्थन से उसकी नैया पार हो सकती है.
कांग्रेस ने दावेदारी इसलिए भी कर रखी है कि वह सत्ता में दूसरा सबसे बड़ा दल है और राज्यसभा में उसके सामने झारखंड से एक सदस्य बढ़ाने का मौका भी है. अलग-अलग राज्यों में भाजपा की बड़ी जीत और बनती सरकारों की वजह से राज्यसभा में कांग्रेस के लिए वैसे ही स्पेस सिमटता जा रहा है.
लेकिन कांग्रेस को झारखंड से एक सीट दिए जाने और उसकी जीत सुनिश्चित कराने में भी हेमंत सोरेन की ही रणनीति काम आने वाली है. अगर हेमंत सोरेन ने थोड़ी सी भी नजरें फेर ली, तो कांग्रेस संकट में पड़ सकती है.
झारखंड मुक्ति मोर्चा किसी प्रकास के जोखिम उठाने से पहले अपनी सीट पर 28 से ज्यादा वोट करना चाहेगा. यानी प्रथम वरीयता में झामुमो 28 वोट के साथ आगे बढ़ना नहीं चाहेगा. तब कांग्रेस को दूसरी वरीयता के आधार पर भाजपा के साथ टकराना पड़ सकता है.
एक और बात रेखांकित की जा सकती है कि हेमंत सोरेन ने एक सीट कांग्रेस के लिए छोड़ भी दी, तो कांग्रेस के सामने अपने 16 विधायकों को इंटैक्ट रखने की भी चुनौती होगी.
हाल ही में बिहार में हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के तीन विधायक का एब्सेंट रहना उसकी रणनीति पर ही सवाल खड़ा करता है.
बीजेपी की नजरें कहां पर है
वहीं संख्याबल नहीं होते हुए भी बीजेपी ने राज्यसभा में उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है. जाहिर तौर पर बीजेपी की नजर सत्तारूढ़ दलों के विधायकों पर है. बीजेपी के पास 21 विधायक हैं. और एनडीए में 24. एक वोट झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के जयराम महतो का है. जयराम किसका साथ देंगे, उन्होंने भी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. लेकिन कांग्रेस और बीजेपी दोनों जयराम का वोट हासिल करना चाहेगी.
लेकिन सत्तारूढ़ दल एकजुट रह गए, कांग्रेस में उम्मीदवार तय करने में बाहरी- स्थानीय का पेच नहीं फंसा और हेमंत सोरेन ने दिल से ऱणनीतिक कमान संभाल ली, तो भाजपा की राह कठिन होगी.
