रांचीः विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार में अधिकारियों की कार्य संस्कृति और कथित राजनीतिक संरक्षण पर सवाल खड़े करते हुए आगाह कराया है कि काग़ज़ी सबूत और दस्तावेज़ कभी पूरी तरह नष्ट नहीं होते. उन्हें कुछ समय के लिए, कभी-कभी वर्षों तक दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता.
इसके साथ ही उन्होंने कहा है, “झारखंड के वे अधिकारी, जो यह भ्रम पालकर बैठे हैं कि धन, पद, राजनीतिक संरक्षण या ऊँची पहुँच उन्हें हमेशा बचाए रखेगी, उन्हें इतिहास के पन्ने पलटकर देख लेने चाहिए. फाइलें भले आज अलमारी में बंद हों, जांच भले किसी टेबल पर धूल खा रही हो, और शिकायतें भले अभी दबा दी गई हों, लेकिन सरकारी अभिलेखों में शामिल एक नोटशीट, एक हस्ताक्षर, एक भुगतान आदेश, एक निविदा, एक बैंक लेन-देन या एक सरकारी पत्राचार वर्षों बाद भी गवाही देने के लिए पर्याप्त होता है.”
श्याम बिहारी का जिक्र
एक्स पर एक पोस्ट में मरांडी ने पशुपालन घोटाले के सूत्रधार श्याम बिहारी सिन्हा का जिक्र करते हुए कहा है कि इस घोटाले का भांडा फूटने में भी एक दशक से अधिक समय लग गया था. लेकिन जब परतें खुलनी शुरू हुईं, तो ऐसी खुलीं कि उसके राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव वर्षों तक महसूस किए जाते रहे. उस प्रकरण ने यह साबित कर दिया कि सत्ता, संपर्क और प्रभाव चाहे जितने बड़े क्यों न हों, दस्तावेज़ों में दर्ज सच एक दिन अपना रास्ता बना ही लेता है.
मरांडी ने चेताया भी
मरांडी ने कहा है, “याद रखिए, इसलिए जो लोग आज जनता के अधिकारों, सरकारी धन और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि कानून की गति भले धीमी हो, लेकिन उसकी पकड़ बहुत लंबी होती है. आज जो फाइलें मोटी हो रही हैं, वे कल आरोपपत्र बन सकती हैं. जो नोटिंग आज दबाई जा रही है, वही कल अदालत में साक्ष्य बन सकती है. नसीहत केवल इतनी है—कुर्सी अस्थायी है, सत्ता अस्थायी है, प्रभाव अस्थायी है, लेकिन कर्मों का लेखा-जोखा स्थायी है. हर दस्तावेज़ बोलता है, हर हस्ताक्षर गवाही देता है और हर फाइल का एक दिन खुलना तय है. उस दिन केवल वही लोग निश्चिंत होंगे जिनके हाथ साफ़ होंगे.”
