रांचीः झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आर्युविज्ञान संस्थान (रिम्स) की दूसरी परियोजना को लेकर तमाम विरोध के बाद प्रशासन ने गुरुवार से काम शुरू करा दिया है.
नगड़ी मौजा के ग्रामीण और रैयत 257 एकड़ की जमीन रिम्स टू के लिए देना नहीं चाहते. उनका जोर रहा है कि खेती के लिए उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण उनकी आजीविका के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट बनेगा.
उनका मानना है कि सरकार को अस्पताल के लिए किसी वैकल्पिक भूमि का चयन करना चाहिए.
बुधवार को भी स्थानीय ग्रामीण और खासकर महिलाएं उस मौजा में विरोध प्रकट करने के लिए आए थे.
लेकिन बड़ी संख्या में पुलिस बलों की तैनाती और अधिकारियों की मौजूदगी में काम शुरू किया गया है. इस काम में कई जेएसबी लगाए गए हैं. रैयतों और अलग-अलग आदिवासी संगठनों ने जिले के उपायुक्त से हस्तक्षेप की मांग की है.
हालांकि सरकारी पक्ष है कि बीएयू को दी गई यह जमीन दशकों पहले ही अधिग्रहित कर ली गई है. प्रस्तावित रिम्स-2 स्थल के लिए सीमांकन और सुरक्षा बाड़ लगाने का काम पूरा हो गया है.
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार भूमि को वर्ष 1957-58 में अधिग्रहित बताती है, लेकिन आज भी यह जमीन स्थानीय लोगों की खेती और रोजी-रोटी का प्रमुख साधन बनी हुई है. इसी कारण ग्रामीण और आदिवासी संगठन निर्माण कार्य के विरोध में एकजुट होकर खड़े है.
पिछले साल अगस्त महीने में
गौरतलब है कि पिछले साल अगस्त महीने में विभिन्न संगठनों, राजनीतिक दलों और रैयतों ने जमीन बचाने की इस लड़ाई में खेत जोतो, रोपा रोपो मुहिम के साथ हल- बैल लेकर खेतों में उतरे थे. तब पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े थे. इस विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने भी शामिल होने की हुंकार भरी थी. आंदोलन के दिन सुबह से ही उन्हें रांची में हाउस अरेस्ट कर लिया गया था.
